बार काउंसिल नियमों में बदलाव की मांग उत्तर प्रदेश की बार एसोसिएशनों में वार्षिक चुनाव से पहले तेज हो गई है। खतौली तहसील में विधि व्यवसाय कर रहे युवा अधिवक्ता अभिषेक गोयल ने अध्यक्ष और महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर चुनाव लड़ने के लिए उम्र और लंबे अनुभव की अनिवार्य शर्त को अलोकतांत्रिक बताया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में नेतृत्व का आधार कार्य करने की क्षमता और संकल्प होना चाहिए, न कि केवल अनुभव के वर्ष।
बार काउंसिल नियमों में बदलाव पर अभिषेक गोयल का तर्क
अभिषेक गोयल के अनुसार, देशभर में युवा वकील लंबे समय से वरिष्ठता के नाम पर थोपे जा रहे आयु और अनुभव के नियमों पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब देश में विधायक और सांसद बनने के लिए 25 वर्ष की आयु पर्याप्त है, तो बार एसोसिएशन के नेतृत्व के लिए दशकों का इंतजार क्यों जरूरी हो। उन्होंने अनुच्छेद 84 (ख) का हवाला देते हुए कहा कि यदि 25 वर्ष का व्यक्ति राष्ट्र का नेतृत्व कर सकता है, तो वकीलों के संगठन के लिए 15-20 साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य करना युवा प्रतिभाओं को अवसर से वंचित करने जैसा है।
नेतृत्व परिवर्तन की मांग ने लिया नया मोड़
उत्तर प्रदेश की तहसील से लेकर हाई कोर्ट तक की बार एसोसिएशनों में नेतृत्व परिवर्तन की मांग अब व्यापक रूप लेती दिख रही है। युवा अधिवक्ताओं का कहना है कि पुराने नियमों के कारण नए और ऊर्जावान नेतृत्व को आगे आने का मौका नहीं मिल पा रहा है। अभिषेक गोयल ने कहा कि डिजिटल युग में बार को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है, जो आधुनिक तकनीक को समझे और युवा अधिवक्ताओं की समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभा सके।
लोकतंत्र और अवसर की बहस
युवा अधिवक्ताओं का मानना है कि बार काउंसिल नियमों में बदलाव समय की मांग है। उनका कहना है कि योग्यता को अनुभव के वर्षों से नहीं, बल्कि कार्यक्षमता और दृष्टि से आंका जाना चाहिए। वार्षिक चुनावों के बीच उठी यह मांग आने वाले दिनों में बार एसोसिएशन और बार काउंसिल के भीतर व्यापक बहस का विषय बन सकती है।






