चेयरमैन जहीर फारूकी ने गन्दगी से निकालकर रोशन किया शहीदों का बलिदान

मुजफ्फरनगर। देश की आजादी का जिक्र आए और उसमें जनपद मुजफ्फरनगर के कस्बा पुरकाजी स्थित सूली वाला बाग का नाम ना लिया जाए तो ये देश के शहीदों का अपमान होगा। जनपद मुजफ्फरनगर का कस्बा पुरकाजी उत्तर प्रदेश को उत्तराखंड से जोड़ता है। इस कस्बे का अपना इतिहास रहा है, लेकिन इस इतिहास को मिटाने का भरसक प्रयास किया गया, शहीदों की अनदेखी और उनके प्रति नकारात्मक भावना रखने वाले कुछ लोगों ने इस शहादत को धरती में दफन कर गन्दगी की कहानी बनाकर रख दिया था, लेकिन पुरकाजी में रुड़की रोड पर बाहरी छोर पर शहीदों के इतिहास को समेटने वाले सूली वाला बाग को गन्दगी के अम्बार से निकालकर विकास की चांदनी से रोशन करने का काम नगर पंचायत के चेयरमैन जहीर फारूकी एडवोकेट ने करके दिखाया है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उनका यह प्रयास आम लोगों के बीच सकारात्मक चर्चा का केन्द्र बना है।

जहीर फारूकी के पुरकाजी नगर पंचायत के चेयरमैन निर्वाचित होने से पहले सूली वाला बाग

जहीर फारूकी के पुरकाजी नगर पंचायत के चेयरमैन निर्वाचित होने से पहले सूली वाला बाग

इस सली वाला बाग के बारे में यह कहा जाता है कि 1857 की क्रांति के दौरान इस जगह पर सैकड़ांे लोगों को अंग्रेजों ने सूली चढ़कर शहीद किया है। इसीलिए इस जगह का नाम सूर्य वाला बाग के नाम से जाना जाता है। यहां के बुजुर्गों का कहना है कि हिंदुस्तान की आजाद होने तक सूली वाला बाग पर अंग्रेजों ने लोगों को फांसी पर चढ़ाया है। इतिहास की किताब मुजफ्फरनगर दर्शन और बुजुर्गों की मानें तो देश की आजादी में दी गई शहादतों में जलियावला बाग से पहला इतिहास पुरकाजी के सूली वाला बाग का है। इतिहासकार प्रदीप जैन के अनुसार आज जो मुजफ्फरनगर की शहर कोतवाली है इसी जगह 1857 की क्रांति के समय कोतवाली और तहसील दोनो एक साथ हुआ करते थे। 1857 की क्रांति में मुजफ्फरनगर जिला परिषद मार्किट के आस पास क्रांतिकारियों ने अंग्रेज जेल दरोगा बटरफील्ड और लेफ्टिनेट जनरल जाॅन स्मिथ को मौत के घाट उतार दिया था। मुजफ्फरनगर में मौजूद अंग्रेजों ने कोतवाली में घुसकर अंदर से दरवाजा बन्द करके अपनी जान बचाई थी। अंग्रेजों ने फिर रुड़की से अपनी सेना की टुकड़ी बुलाई जिस पर पुरकाजी क्षेत्र में हमला करके उनके हथियार छीन लिए गए और क्रांतिकारियों ने कुछ अंग्रेजो की हत्या कर दी और लूटे गए हथियार जिनमे तोपें बंदूके और गोले व गोलियां थी। उन्हें पुरकाजी से खादर मार्ग पर वर्तमान में हरीनगर गांव के दलदली क्षेत्र में दबा दिया था। कई बार इस गांव से कई तोपें निकल चुकी हैं। जंगल से गोले निकल चुके हैं। कुछ साल पहले गांव के सीधे सादे दो लोगांे के हाथ पीतल के गोले लग गए घर में लाकर पीतल पिघलाने के लालच में वो गोले फट गए थे और दोनांे लोग और पशु वहीं मौके पर मारे गए थे। दो अंग्रेज अफसरों सहित कई अंग्रेजों की हत्याओं से अंग्रेज बौखला गए और उनकी सैन्य टुकड़ी मुजफ्फरनगर के आस पास थानाभवन, शामली, सरधना के इलाकों में घुस गई। वहां से आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों को पकड़ पकड़ कर पुरकाजी के सूली वाला बाग पर लाकर उन्हें सूली चढ़ाया गया।

शोभाराम त्यागी नाम के क्रांतिकारी को इसी जगह अंग्रेजांे ने जमीन में गाड़कर कुत्तों से फड़वाकर शहीद किया था। पुरकाजी के सूलीवाला बाग पर सैकड़ों देशभक्त महिला एवं पुरुषो को फांसी दी गई है, लेकिन देश का दुर्भाग्य ही है कि भारत देश जिन क्रांतिकारियों की शहादत के बूते पर आजाद हुआ उन शहीदों और उनके परिवार को हमारे आजाद हिंदुस्तान में ना तो उचित सम्मान ही मिला ना ही कोई सुविधा मिली। यहां तक कि आजाद हिंदुस्तान में आज तक भी कोई शहीदों को अधिकृत लिस्ट तक बनाई नही गई है देश के स्कूलों में शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, अशफाक उल्ला खान, अमर रहे के नारे तो लगवाए जाते रहे, लेकिन देश में इन सहित हजारों शहीदों को आज तक शहादत का सम्मान नहीं मिला है। पुरकाजी का सूलीवाला बाग भी हिंदुस्तान की खराब राजनीति की भेंट चढ़ गया देश आजाद होने के बाद जिन जगहों को संग्रहित करके उन्हें शहीद स्थल बनाया जाना चाहिए था। उनका जिक्र तक सरकारों ने किसी जगह नही किया गया। पुरकाजी के सूली वाला बाग में अंग्रेज जिस जगह क्रांतिकारियों को शहीद किया करते थे। उस जगह पत्थर की दो सफील खड़ी करके उसके ऊपर एक पट सफील पत्थर की थी, जिसमे दो लोगो के हाथ और ऊपर निकालकर फांसी देने का फंदा बनाया गया था। ये पत्थर की सफील के गवाह आज भी पुरकाजी और देहात में जिंदा है पुरकाजी के इस ऐतिहासिक सूली वाला बाग पर जहां शहीद स्थल बनना चाहिए था। यहां गंदगी और मरे हुए जानवरों के ढेर लगा करते थे। इतनी बुरी हालत में ये जगह थी कि लोग बिना अपना मुंह ढके यहां से गुजर भी नही सकते थे देश की खराब सियासत की वजह से देश की आजादी में सैकडो शहीदों की शहादत का गवाह पुरकाजी का सूली वाला बाग गुमनामी के अंधेरों में खो गया है।

पुरकाजी नगर पंचायत के चेयरमैन जहीर फारूकी ने सूलीवाला बाग के शहीदों को उनका सम्मान दिलाने और सूली वाला बाग को शहीद स्थल बनवाने की मांग को लेकर 2015 से आंदोलन और धरना प्रदर्शन करना शुरू किया था। उनके आनंदोलनो से तभी वहां गंदगी पड़ना बंद हुई और चेयरमैन बनने के बाद इस जगह आज साफ सुथरा मिनी पार्क बन चुका है, लेकिन आज तक शहीद स्थल नही बन सका है। चेयरमैन जहीर फारूकी का कहना है कि मुगलों द्वारा बनाया गया लाल किला गुलामी का प्रतीक है फिर भी लाल किले पर तो देश के सभी प्रधानमंत्री नेता तिरंगा झंडा फहराते हैं। जबकि देश को आजाद कराने में पुरकाजी के सूली वाला बाग में 1857 से 1947 तक और जलियांवाला बाग में 1919 में सैकड़ों सामूहिक शहादतों को अंग्रेजों ने अंजाम दिया है। ये शहीद स्थल हमारे लिए शौर्य के प्रतीक हैं देश की आजादी के बाद शहीदों के सम्मान में प्रति वर्ष इन दोनो जगहों पर देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ध्वजारोहण करना चाहिए था। हर प्रदेश के शहीद स्थलों पर वहां के मुख्यमंत्री या राज्यपाल अथवा केबिनेट मंत्रियों को ध्वजारोहण करके देश के शहीदों को सच्ची श्र(ांजलि देनी चाहिए थी। लेकिन गुलामी के प्रतीक लालकिले पर सब झंडा फहराते हैं शहीदों की कुर्बानी पर शहीद स्थलों की आजादी के बाद किसी सरकार ने सुध नहीं ली है। फारूकी का कहना है कि देश में एक कानून लाना चाहिए कि देश का हर स्वस्थ्य नागरिक प्रत्येक राष्ट्रीय पर्व पर ध्वजारोहण कार्यक्रम मे भाग जरूर लेगा वरना उस पर जुर्माना लगेगा ही जगह बड़े बड़े मैदान में ऐसे सरकारी कार्यक्रमों का आयोजन होना चाहिए सरकार को देश की आजादी के लिए शहीद हुए सभी शहीदों की लिस्ट सार्वजनिक करके उनके परिजनों को सभी सुख सुविधा देनी चाहिए और सूली वाला बाग को शहीद स्थल घोषित करना चाहिए वरना सूलीवाला बाग जैसे शहीद स्थल इसी तरह बर्बाद होते रहेंगे।

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