सिसौली से गूंजा प्राकृतिक खेती का संदेश, चार दिवसीय शिविर का समापन

पदम श्री डॉ. सुभाष पालेकर ने बताए लाभकारी खेती के सूत्र, किसानों ने टिकाऊ खेती अपनाने का लिया संकल्प

मुजफ्फरनगर। जनपद मुजफ्फरनगर के सिसौली स्थित किसान भवन में भारतीय किसान यूनियन द्वारा आयोजित चार दिवसीय प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण शिविर का समापन बुधवार को हुआ। देश के अनेक राज्यों से पहुंचे किसानों ने टिकाऊ खेती के आधुनिक और पारंपरिक तरीकों को समझा तथा प्राकृतिक खेती अपनाने का संकल्प लिया। सिसौली स्थित किसान भवन में आयोजित चार दिवसीय प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण शिविर में पदम श्री डॉ. सुभाष पालेकर ने किसानों को प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों, तकनीकों और उसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

किसान भवन सिसौली में इस शिविर का शुभारंभ 22 मार्च को किया गया था। इसमें प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. सुभाष पालेकर ने किसानों को शून्य बजट प्राकृतिक खेती के विभिन्न तरीकों से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण अनिवार्य है। वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जिससे लागत घटती है और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होता है।

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पराली प्रबंधन के विषय में उन्होंने कहा कि पराली जलाना पर्यावरण और मिट्टी दोनों के लिए हानिकारक है। किसानों को पराली को जलाने के बजाय जैविक खाद के रूप में उपयोग करने की सलाह दी गई, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ खेती को भी लाभ मिल सके। डॉ. पालेकर ने प्राकृतिक खेती के वैज्ञानिक पहलुओं को समझाते हुए कहा कि किसी भी सजीव शरीर में बाहरी रासायनिक तत्वों को स्वीकार करने की क्षमता नहीं होती। रासायनिक कीटनाशक, फफूंदनाशक और खरपतवारनाशक के अवशेष पौधों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देते हैं, जिससे फसल पर कीटों और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

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उन्होंने मित्र और शत्रु कीटों के संतुलन की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए बताया कि प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए परभक्षी और परजीवी कीटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्राकृतिक खेती के प्रमुख घटकों—बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत, आच्छादन, वाफसा और अंतरफसली जैव विविधता—पर विस्तार से जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि जीवामृत देसी गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़, दाल के आटे, मिट्टी और पानी से तैयार किया जाता है, जो मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाकर फसल की वृद्धि में सहायक होता है।

इस अवसर पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता गिर रही है, जिसका असर किसानों की आय और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम के दौरान गौतम बुद्ध नगर से आए किसानों ने डॉ. पालेकर का पगड़ी बांधकर सम्मान किया। वहीं, भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती किसानों के लिए भविष्य का सुरक्षित विकल्प है, जिससे लागत घटाकर आय बढ़ाई जा सकती है। भाकियू के युवा विंग के अध्यक्ष चौधरी गौरव टिकैत ने बताया कि शिविर में उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों से आए किसान, कृषि विशेषज्ञ और पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी प्रतिभागियों ने प्राकृतिक खेती को गांव-गांव तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

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