बाबरी नाम पर मस्जिद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका को शुक्रवार को शीर्ष न्यायालय ने खारिज कर दिया। याचिका में मांग की गई थी कि मस्जिद के नाम में ‘बाबरी’ शब्द के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए। अदालत ने इस पर सुनवाई से इनकार कर दिया।यह याचिका ऐसे समय में दाखिल की गई, जब पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बाबरी नाम से मस्जिद का निर्माण कार्य चल रहा है।
अदालत ने सुनवाई से किया इनकार
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि बाबर एक ‘आक्रमणकारी’ था, इसलिए उसके नाम पर किसी भी मस्जिद का निर्माण या नामकरण नहीं होना चाहिए। अदालत में यह भी दलील दी गई कि बाबर ने हिंदुओं को ‘गुलाम’ कहकर संबोधित किया था और इस तरह की गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
मुर्शिदाबाद में निर्माण को लेकर विवाद बाबरी नाम पर मस्जिद को लेकर मुर्शिदाबाद में राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने यहां बाबरी मस्जिद बनवाने का ऐलान किया है। 11 फरवरी को कबीर ने घोषणा की थी कि बेलडांगा के रेजिनगर में बनने वाली इस मस्जिद का निर्माण दो साल के भीतर पूरा किया जाएगा। उन्होंने बताया था कि इसकी अनुमानित लागत लगभग 50 से 55 करोड़ रुपये होगी। 11 एकड़ में बनेगी मस्जिद जानकारी के अनुसार, मस्जिद 11 एकड़ जमीन पर बनाई जा रही है। इसमें करीब 12,000 लोगों के नमाज अदा करने की क्षमता होगी। कबीर ने कहा कि कई पक्षों के विरोध के बावजूद निर्माण कार्य तय कार्यक्रम के अनुसार जारी है।
उन्होंने पिछले साल छह दिसंबर को अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद की नींव रखी थी।1992 और 2019 के फैसले का संदर्भ अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचे को छह दिसंबर 1992 को कार सेवकों ने ढहा दिया था। उच्चतम न्यायालय ने नौ नवंबर 2019 को अपने फैसले में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण और मुसलमानों को अयोध्या में किसी प्रमुख स्थान पर पांच एकड़ जमीन मस्जिद निर्माण के लिए देने का आदेश दिया था। फिलहाल, बाबरी नाम पर मस्जिद को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना है।






