नई दिल्ली। ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट में भारत की भूमिका को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत इस परियोजना से बाहर निकल सकता है। हालांकि, भारत सरकार ने इन अटकलों को खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि चाबहार पोर्ट से पीछे हटना कोई विकल्प नहीं है, भले ही अमेरिकी प्रतिबंधों में दी गई छूट की समय सीमा समाप्त होने के करीब हो।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए वॉशिंगटन के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट की ओर से एक पत्र जारी किया गया था, जिसमें 26 अप्रैल 2026 तक कंडीशनल प्रतिबंध छूट से संबंधित दिशा-निर्देश दिए गए थे। भारत इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी पक्ष के संपर्क में है।
प्रतिबंधों की समय सीमा पर मंथन
पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट में भारत की भागीदारी को देखते हुए छह महीने की अस्थायी छूट दी गई थी। यह छूट 26 अप्रैल को समाप्त होने वाली है। इससे पहले सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया था कि अमेरिका से बातचीत के बाद अप्रैल 2026 तक अतिरिक्त विस्तार पर विचार किया जा सकता है, लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि किसी अस्थायी या सीमित समाधान को स्वीकार करना उसके हित में नहीं है।
भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार
भारत के लिए चाबहार बंदरगाह लंबे समय से एक रणनीतिक वेस्टर्न कॉरिडोर की तरह काम करता रहा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह भारत को पाकिस्तान से गुजरे बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी समुद्री पहुंच देता है। चूंकि पाकिस्तान के जरिए जमीनी मार्ग भारतीय व्यापार के लिए लगभग बंद हैं, ऐसे में चाबहार भारत के लिए एक अहम वैकल्पिक रास्ता बनकर उभरा है।
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित यह बंदरगाह भारत की पश्चिमी दिशा में कनेक्टिविटी से जुड़ी भू-राजनीतिक बाधाओं को दूर करता है। अफगानिस्तान में मानवीय सहायता और व्यापारिक आपूर्ति के लिए भी यह मार्ग भारत के लिए बेहद उपयोगी रहा है।
इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर का अहम हिस्सा
चाबहार सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है, बल्कि यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मल्टी-मॉडल नेटवर्क भारत को ईरान, रूस और यूरोप से जोड़ता है। समुद्री, सड़क और रेल मार्गों के जरिए यह कॉरिडोर पारंपरिक समुद्री रास्तों की तुलना में यात्रा समय और लॉजिस्टिक्स लागत दोनों को कम करने में सक्षम माना जाता है।
भारत के व्यापक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापार विस्तार की रणनीति में चाबहार बंदरगाह को एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, यही वजह है कि भारत इस परियोजना से अलग होने को तैयार नहीं है।
भारत की विदेश नीति में चाबहार की भूमिका
चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति का अहम हिस्सा है। यह परियोजना न केवल व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच को मजबूत बनाती है। इसके जरिए भारत मानवीय सहायता और व्यापार दोनों को सुगम बना पाता है।
चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से जुड़ा हुआ है, जिससे भारत को रूस और यूरोप तक वैकल्पिक मार्ग मिलता है। इससे लॉजिस्टिक्स लागत घटने और व्यापार समय कम होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में भारत के लिए चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से पीछे हटना रणनीतिक नुकसान साबित हो सकता है। यही कारण है कि भारत इस परियोजना पर अपने रुख को स्पष्ट रूप से बनाए हुए है।






