जोधपुर जेल में एकांत कारावास के बीच भी सकारात्मक हैं Sonam Wangchuk, जेल अनुभवों पर लिख रहे किताब

Sonam Wangchu नई दिल्ली | जोधपुर प्रसिद्ध क्लाइमेट एक्टिविस्ट और इनोवेटर सोनम वांगचुक (Sonam Wangchu) जोधपुर जेल में एकांत कारावास की कठिन परिस्थितियों के बावजूद मानसिक रूप से मजबूत और आशावादी बने हुए हैं। उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने बताया कि जेल में बिताए जा रहे समय का वांगचुक सकारात्मक उपयोग करते हुए अपने अनुभवों पर आधारित एक किताब लिख रहे हैं, जिसका प्रस्तावित शीर्षक ‘फॉरएवर पॉजिटिव’ रखा गया है।

एक इंटरव्यू में गीतांजलि आंगमो ने कहा कि तीन महीने से अधिक समय से जेल में रहने के बावजूद वांगचुक का मनोबल कमजोर नहीं पड़ा है। उन्होंने बताया कि कठिन हालातों के बीच भी वे आत्मचिंतन, पढ़ाई और लेखन में खुद को व्यस्त रख रहे हैं।
आंगमो के मुताबिक, “सकारात्मक सोच वाले लोग हर परिस्थिति को स्वीकार करना जानते हैं। हालांकि सोनम जिस माहौल में हैं, वह बेहद कठिन है, लेकिन वे उसे भी सीख और अनुभव में बदल रहे हैं।”

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आंगमो के मुताबिक, “सकारात्मक सोच वाले लोग हर परिस्थिति को स्वीकार करना जानते हैं। हालांकि सोनम जिस माहौल में हैं, वह बेहद कठिन है, लेकिन वे उसे भी सीख और अनुभव में बदल रहे हैं।”

सोनम वांगचुक (Sonam Wangchu) पिछले 110 दिनों से अधिक समय से जेल में हैं। उन्हें 26 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था। यह गिरफ्तारी लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर किए गए 15 दिन के उपवास के बाद हुई थी। लेह में हुई हिंसा के बाद हालात बिगड़ने पर उन्हें हिरासत में लिया गया था, जिसमें चार लोगों की मौत की भी पुष्टि हुई थी।

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गीतांजलि आंगमो ने बताया कि जेल में रहते हुए वांगचुक को चींटियों के व्यवहार में भी रुचि पैदा हो गई है। वे चींटी समुदाय की एकजुटता और टीम भावना से प्रभावित हैं और इस विषय पर पढ़ने की इच्छा भी जताते हैं। उनके अनुसार, वांगचुक मानते हैं कि प्रकृति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

आंगमो के अनुसार, वांगचुक एक बैरक में फर्श पर कंबल ओढ़कर सोते हैं, जहां न तो फर्नीचर है और न ही पर्याप्त जगह। उनके पास फोन, टीवी या घड़ी जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। यहां तक कि परिवार द्वारा दिए गए अखबारों में से लद्दाख या उनसे जुड़ी खबरों को काट दिया जाता है।

उन्होंने बताया कि जब अखबार में कटी हुई खबरें दिखती हैं, तो वांगचुक समझ जाते हैं कि उस दिन या तो उनकी तस्वीर छपी होगी या खबर लद्दाख से जुड़ी होगी।

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इन सभी प्रतिबंधों के बावजूद सोनम वांगचुक अपने दिन का अधिकांश समय ध्यान, पढ़ने और व्यायाम में लगाते हैं। उनकी पत्नी के मुताबिक, वांगचुक हर स्थिति का अधिकतम लाभ उठाने की कोशिश करते हैं और जेल के समय को भी अपनी आत्मिक और मानसिक प्रगति का माध्यम बना रहे हैं।

गीतांजलि आंगमो ने कहा कि दो महीने बाद ही वांगचुक ने परिवार को जेल की कठिनाइयों के बारे में बताया। शुरुआती समय में दोनों ने एक-दूसरे से अपनी परेशानियां साझा नहीं कीं और मजबूती दिखाने की कोशिश की।

उन्होंने कहा,

“वे स्वभाव से बेहद सकारात्मक हैं। कम सुविधाओं में भी संतुष्ट रहना और हर स्थिति में उम्मीद देखना उनकी सबसे बड़ी ताकत है।”

 

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