जनवरी का महीना कुछ परिवारों के लिए केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि जीवन भर न भरने वाला एक गहरा घाव बन जाता है। ऐसा ही एक परिवार है एडवोकेट नंदन भारद्वाज का, जिसके लिए 13 जनवरी केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि स्मृतियों, पीड़ा और संकल्प का प्रतीक बन चुकी है। इस परिवार की जड़ें राष्ट्रसेवा और सामाजिक दायित्व से जुड़ी रही हैं। एडवोकेट नंदन भारद्वाज के दादा मेजर हरदयाल भारद्वाज, जो भारतीय सेना में लेफ्ट कर्नल रैंक पर कार्यरत थे, वर्ष 1971 के भारत–पाक युद्ध में देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनका जीवन और बलिदान न केवल परिवार, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए गौरव का विषय रहा है। उनका नाम आज भी साहस, अनुशासन और देशभक्ति की मिसाल के रूप में स्मरण किया जाता है। समय आगे बढ़ा, लेकिन परिवार की परीक्षा समाप्त नहीं हुई। 13 जनवरी 2019 को एडवोकेट नंदन भारद्वाज के पिता दीपक भारद्वाज (अधिवक्ता) का कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लंबी लड़ाई के बाद निधन हो गया। वे केवल एक पिता ही नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, संवेदनशील अधिवक्ता और समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति थे। उनके निधन से परिवार और समाज में जो रिक्तता उत्पन्न हुई, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। एडवोकेट नंदन भारद्वाज स्वयं स्वीकार करते हैं कि जनवरी का महीना उनके और उनके परिवार के लिए हर वर्ष एक भावनात्मक संघर्ष लेकर आता है — ऐसा समय, जब स्मृतियाँ भीतर तक झकझोर देती हैं और मन मौन होकर भी बहुत कुछ कह देना चाहता है। इन तमाम व्यक्तिगत दुखों के बावजूद, एडवोकेट नंदन भारद्वाज ने अपने दादा और पिता से मिली मूल्यों की विरासत को कमजोर नहीं पड़ने दिया। वे आज एक कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और समाज के प्रति उत्तरदायी अधिवक्ता के रूप में न्याय, सत्य और मानवता के मार्ग पर निरंतर कार्य कर रहे हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सेवा और संकल्प की परंपरा केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज और न्याय व्यवस्था में भी जीवित रहती है। यह आलेख केवल एक परिवार के दुख की कथा नहीं, बल्कि उस अटूट हौसले और आत्मबल की कहानी है, जो पीड़ा के बाद भी कर्तव्य और सेवा को आगे बढ़ाता है। 13 जनवरी — एक ऐसी तारीख, जिसने इस परिवार से बहुत कुछ छीन लिया, लेकिन बदले में उन्हें संघर्ष से उपजी मजबूती और जिम्मेदारी की चेतना भी प्रदान की।

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