संगम विवाद से सुप्रीम कोर्ट तक: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर क्यों उठे सवाल?

प्रयागराज। मौनी अमावस्या के दिन संगम घाट पर गंगा स्नान को लेकर उपजा टकराव अब सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की धार्मिक पहचान और वैधानिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। स्नान रोके जाने के बाद उनके शिष्यों और पुलिस के बीच हुई झड़प, फिर संगम पर धरना और उसके बाद प्रशासन की ओर से नोटिस—इन घटनाओं ने विवाद को और गहरा कर दिया है।

प्रशासन ने न केवल धरने पर आपत्ति जताई, बल्कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से उनके शंकराचार्य पद को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा। यहीं से सवाल फिर उठ खड़ा हुआ—क्या वे वास्तव में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य हैं?

संन्यास से शंकराचार्य तक का सफर

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का सांसारिक नाम उमाशंकर उपाध्याय रहा है। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में जन्मे अविमुक्तेश्वरानंद ने कम उम्र में ही संस्कृत, वेद, उपनिषद, पुराण और वेदांत की शिक्षा ग्रहण की। वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और छात्रसंघ चुनाव जीत चुके हैं।

1990 के दशक में उन्होंने संन्यास मार्ग अपनाया। इस दौरान उनका सान्निध्य धर्म और राजनीति दोनों में प्रभाव रखने वाले स्वामी करपात्री जी महाराज से हुआ, जिनकी सेवा वे अंतिम समय तक करते रहे। यहीं से उनका संपर्क ज्योतिषपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से बना।

15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा दी गई और तभी उन्हें नया नाम मिला—स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती।

नियुक्ति बनी विवाद की जड़

सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, अविमुक्तेश्वरानंद को जोशीमठ स्थित ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित किया गया। लेकिन यह घोषणा होते ही विरोध के स्वर भी तेज हो गए।

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अखाड़ा परिषद से जुड़े कई संतों और संन्यासी संगठनों ने नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। उनका तर्क था कि शंकराचार्य पद के लिए पारंपरिक और सर्वमान्य प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।

निरंजनी अखाड़े के सचिव और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने उस समय साफ कहा था कि यह नियुक्ति नियमसम्मत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है मामला?

यह विवाद अब केवल धार्मिक मंचों तक सीमित नहीं है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और वर्षों से लंबित है।

  • सिविल अपील नंबर 3010/2020
  • SLP (C) नंबर 34253/2017

अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने ज्योतिषपीठ में नए शंकराचार्य के रूप में उनके औपचारिक पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी थी। यह आदेश उस हलफनामे के बाद आया, जिसमें पुरी गोवर्धन मठ के शंकराचार्य ने उनकी नियुक्ति को समर्थन न देने की बात कही थी।

हालांकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील टी.एन. मिश्रा का दावा है कि कोर्ट की पिछली कार्यवाहियों में उन्हें स्वयं “शंकराचार्य” के रूप में संबोधित किया गया है, जिससे उनकी वैधानिक स्थिति मजबूत होती है।

बयानों से भी बढ़ा विवाद

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने तीखे और बेबाक बयानों के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने कई बार आरोप लगाया कि राजनीतिक दल सनातन समाज को बांटने का काम कर रहे हैं।

उन्होंने वर्ण व्यवस्था को लेकर कहा कि वेदों में चारों वर्णों को समान बताया गया है, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के लिए इन्हें टकराव में बदला जा रहा है।

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गौहत्या, सिंधु जल समझौता, वक्फ बिल और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी उन्होंने सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए हैं।

केदारनाथ और काशी कॉरिडोर पर आरोप

15 जुलाई 2024 को उन्होंने केदारनाथ मंदिर से 228 किलो सोना गायब होने का आरोप लगाकर हलचल मचा दी थी। इसके अलावा काशी कॉरिडोर परियोजना को लेकर भी उन्होंने दावा किया कि प्राचीन मूर्तियों और मंदिर संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया गया।

उनका कहना रहा है कि वह इन मुद्दों पर जीवनभर विरोध करते रहेंगे, चाहे परिणाम कुछ भी हों।

निष्कर्ष: धार्मिक पद, कानूनी लड़ाई और सियासी टकराव

संगम घाट पर हुआ विवाद सिर्फ एक दिन की घटना नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष की एक और कड़ी है, जिसमें धार्मिक परंपरा, कानूनी वैधता और राजनीतिक टकराव आपस में उलझे हुए हैं।

अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं—जो तय करेगा कि ज्योतिषपीठ का वास्तविक शंकराचार्य कौन है।

राम मंदिर उद्घाटन से दूरी और तीखे बयान

अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर जब देशभर में उत्सव का माहौल था, उसी दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को इस आयोजन से अलग रखा। राम मंदिर के अभिषेक समारोह के लिए उन्हें भी आमंत्रण मिला था, लेकिन उन्होंने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया।

उनका तर्क था कि जिस मंदिर का निर्माण अभी पूर्ण नहीं हुआ है, उसका उद्घाटन धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। उन्होंने इसे “अधूरे मंदिर का अनावरण” बताते हुए कहा कि सनातन परंपरा में आधे-अधूरे निर्माण का उत्सव शास्त्रसम्मत नहीं है।

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इसी क्रम में प्रयागराज महाकुंभ के दौरान हुई भगदड़ की घटनाओं को लेकर भी उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा किया था और व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए थे।

रामभद्राचार्य को लेकर बयान से बढ़ा विवाद

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया, जब उन्होंने जगद्गुरु रामभद्राचार्य को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में संन्यास के नियम स्पष्ट हैं और उनके अनुसार दिव्यांग व्यक्ति को दंड संन्यास का अधिकार नहीं दिया गया है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रामभद्राचार्य द्वारा तुलसीदास, रामानंदाचार्य, आदि शंकराचार्य और चारों पीठों के शंकराचार्यों पर की गई टिप्पणियां शास्त्र और उपनिषदों की मूल भावना के विपरीत हैं। इस बयान के बाद संत समाज में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

बुराड़ी में बन रही केदारनाथ प्रतिकृति पर आपत्ति

दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में बन रही केदारनाथ मंदिर की प्रतिकृति को लेकर भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था। उन्होंने कहा था कि केदारनाथ कोई प्रतीकात्मक स्थल नहीं, बल्कि शिव पुराण में वर्णित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसकी भौगोलिक पहचान स्पष्ट रूप से हिमालय क्षेत्र से जुड़ी है।

उनका कहना था कि जब शास्त्रों में केदारनाथ का स्थान निर्धारित है, तो उसे किसी अन्य स्थान पर “डुप्लीकेट मंदिर” के रूप में स्थापित करना धार्मिक अवधारणाओं के साथ खिलवाड़ है। “यदि केदार हिमालय में है, तो उसे दिल्ली में कैसे स्थापित किया जा सकता है?”—यह सवाल उन्होंने सार्वजनिक मंच से उठाया था।

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