मेरठ | 26 फरवरी 2026 — हस्तिनापुर विधानसभा सीट 2027 को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में नई हलचल दिखाई दे रही है। आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद के इस सीट से चुनाव लड़ने की चर्चाओं ने पश्चिमी यूपी के राजनीतिक समीकरणों को केंद्र में ला दिया है।
हालांकि पार्टी की ओर से अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों ने संकेत दिए हैं कि 2027 का मुकाबला यहां दिलचस्प हो सकता है।
चंद्रशेखर आजाद वर्तमान में बिजनौर की नगीना लोकसभा सीट से सांसद हैं। चर्चा है कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी जन्मभूमि सहारनपुर या कर्मभूमि नगीना की सीट से चुनाव लड़ने के बजाय मेरठ जिले की आरक्षित हस्तिनापुर विधानसभा सीट को प्राथमिकता दे सकते हैं।
हस्तिनापुर सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह सीट सामाजिक समीकरणों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। योगी सरकार में राज्यमंत्री दिनेश खटीक, जो इस सीट से लगातार दो बार विधायक रहे हैं, ने सार्वजनिक कार्यक्रम में तीसरी बार चुनाव न लड़ने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि “हस्तिनापुर श्रापित भूमि है” और उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से तीसरी बार चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया है।
समाजवादी पार्टी क्षेत्र में अपने गुर्जर आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी से जुड़े नेताओं का दावा है कि 2027 में सामाजिक समीकरण बदल सकते हैं।
वहीं बसपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि दलित-मुस्लिम समीकरण इस सीट पर पहले भी प्रभावी रहा है। भाजपा की ओर से अभी तक किसी नई रणनीति की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
हस्तिनापुर विधानसभा सीट का इतिहास सामाजिक समीकरणों से जुड़ा रहा है।
- 2002 और 2012 में समाजवादी पार्टी ने दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे जीत दर्ज की।
- 2007 में बसपा को सफलता मिली।
- 2017 और 2022 में भाजपा ने दलित और गुर्जर समर्थन के साथ जीत हासिल की।
- यह सीट लगभग 3.25 लाख मतदाताओं वाली है।
अनुमानित आंकड़ों के अनुसार:
60–70 हजार दलित मतदाता
1 लाख से अधिक मुस्लिम मतदाता
लगभग 60 हजार गुर्जर मतदाता
जाट, सैनी और पंजाबी मतदाता भी निर्णायक भूमिका में
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि चंद्रशेखर आजाद हस्तिनापुर विधानसभा सीट 2027 से चुनाव लड़ते हैं, तो दलित-मुस्लिम समीकरण पुनः सक्रिय हो सकता है। चंद्रशेखर आजाद जाटव समाज से आते हैं और युवाओं के बीच उनकी पकड़ मानी जाती है। भीम आर्मी के संस्थापक होने के कारण उनका एक स्वतंत्र जनाधार है।
यदि मुस्लिम मतदाता रणनीतिक रूप से एकजुट होते हैं, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा को गुर्जर समीकरण में संभावित बदलाव की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। यह भी दावा किया जाता है कि इस सीट से जीतने वाली पार्टी अक्सर प्रदेश की सत्ता में आती रही है, हालांकि यह राजनीतिक मान्यता है, आधिकारिक तथ्य नहीं।
लोकतांत्रिक राजनीति में सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन मतदाताओं के लिए स्थानीय विकास, प्रशासनिक प्रदर्शन और जनसरोकार भी उतने ही अहम होते हैं। यदि हस्तिनापुर विधानसभा सीट 2027 में नए सामाजिक गठजोड़ बनते हैं, तो यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में व्यापक बदलाव का संकेत हो सकता है।






