पश्चिम बंगाल के मालदा में 7 न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक घेर कर रोके जाने के मामले ने गुरुवार को सीधा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया, और अदालत की पहली प्रतिक्रिया ही बेहद कड़ी रही। Chief Justice of India सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि यह सिर्फ स्थानीय तनाव नहीं दिखाता, बल्कि अदालत के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया को डराने की कोशिश जैसा दिखाई देता है। घटना 1 अप्रैल की बताई गई है, जब कालीचक-II BDO कार्यालय के बाहर शुरू हुआ विरोध देर रात तक खिंच गया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने जो तस्वीर रखी गई, वह साधारण प्रशासनिक गड़बड़ी से कहीं आगे की थी। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक 7 न्यायिक अधिकारी, जिनमें 3 महिलाएं शामिल थीं, दोपहर बाद से रात तक घिरे रहे। हाईकोर्ट रजिस्ट्री की ओर से राज्य प्रशासन को सूचना देने के बाद भी देर तक “कोई ठोस कार्रवाई” नहीं हुई। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि अधिकारियों तक भोजन और पानी तक समय पर नहीं पहुंचा, और जब वे निकाले गए तब उनके वाहनों पर कथित तौर पर पथराव और बांस की लाठियों से हमला हुआ।
यह पूरा विवाद मतदाता सूची से नाम हटने के आरोपों और SIR प्रक्रिया को लेकर गुस्से से जुड़ा है। कालीचक-II ब्लॉक कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रही भीड़ उन लोगों के कागजात और नामों पर आपत्ति जता रही थी जिन्हें सूची से बाहर किए जाने का डर था या जिनके नामों पर विवाद चल रहा था। लेकिन अदालत ने साफ संकेत दिया कि किसी भी असहमति का जवाब न्यायिक अधिकारियों को घेर कर नहीं दिया जा सकता — खासकर तब, जब वे उसी प्रक्रिया का हिस्सा हों जिसे अदालत की निगरानी में आगे बढ़ाया जा रहा हो।
मालदा न्यायिक अधिकारी बंधक मामला इतना बड़ा क्यों बन गया
इस मामले को समझने के लिए पृष्ठभूमि देखनी होगी। 20 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के लिए सेवारत और पूर्व जिला जजों की मदद लेने की अनुमति दी थी। अदालत ने तभी कहा था कि जिला प्रशासन और पुलिस को इन न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा और लॉजिस्टिक सहयोग देना होगा, और उनके आदेश अदालत के आदेश माने जाएंगे। यानी मालदा में घिरे अधिकारी सिर्फ प्रशासनिक टीम का हिस्सा नहीं थे — वे अदालत की तरफ से काम कर रहे थे। यही वजह है कि गुरुवार की सुनवाई में पीठ ने इस घटना को अदालत की अधिकार को चुनौती के रूप में पढ़ा।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें आधी रात तक हालात पर नजर रखनी पड़ी। अदालत ने टिप्पणी की कि यह “सामान्य घटना” नहीं लगती, बल्कि prima facie एक “calculated” और “well-planned” कदम जैसा दिखता है, जिसका असर बाकी न्यायिक अधिकारियों के मनोबल पर भी पड़ सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि वह किसी को यह छूट नहीं देगी कि कानून अपने हाथ में लेकर न्यायिक अधिकारियों के मन में मनोवैज्ञानिक डर पैदा करे। आखिर सवाल यही है — अगर अदालत के काम में लगे अधिकारियों की सुरक्षा ही पक्की न हो, तो निष्पक्ष प्रक्रिया कैसे चलेगी?
राज्य सरकार की दलील क्या रही
सुनवाई में पश्चिम बंगाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने यह रुख रखा कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान व्यवस्था पर चुनाव आयोग का प्रभावी नियंत्रण है, इसलिए राज्य प्रशासन की भूमिका सीमित तरीके से देखी जानी चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस दलील से संतुष्ट नहीं दिखा। पीठ ने साफ कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना आखिरकार राज्य का ही मूल दायित्व है, और यह कह कर हाथ नहीं झाड़े जा सकते कि प्रशासन पूरी तरह किसी और के नियंत्रण में था। अदालत ने यह भी पूछा कि अगर विरोध अराजनैतिक था, तो वहां राजनीतिक चेहरे क्या कर रहे थे।
यहीं से सुनवाई ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया। अदालत ने पश्चिम बंगाल को लेकर तीखी टिप्पणी की और कहा कि वहां हर कोई “political language” बोलता दिख रहा है। यह टिप्पणी अपने आप में असामान्य थी, क्योंकि शीर्ष अदालत आम तौर पर इतना सीधे राजनीतिक ध्रुवीकरण पर नहीं उतरती। इसका अर्थ साफ है: अदालत इस पूरे विवाद को सिर्फ law and order failure नहीं, बल्कि एक ऐसे माहौल के रूप में देख रही है जिसमें संस्थाएं भी दबाव महसूस कर सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या आदेश दिए
अदालत ने मामले को वहीं छोड़ नहीं दिया। सुनवाई के बाद कई तात्कालिक निर्देश दिए गए:
- चुनाव आयोग को कहा गया कि जहां-जहां न्यायिक अधिकारी आपत्तियों और दावों की सुनवाई कर रहे हैं, वहां पर्याप्त केंद्रीय बल तैनात किए जाएं।
- जांच को CBI या NIA जैसी एजेंसी को सौंपने के लिए Election Commission को कदम उठाने को कहा गया।
- मुख्य सचिव, DGP, गृह सचिव और संबंधित जिला अधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा गया कि उनके खिलाफ अवमानना जैसी कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।
- अगली सुनवाई 6 अप्रैल के लिए तय की गई और शीर्ष अधिकारियों को वर्चुअल उपस्थिति का निर्देश दिया गया।






