सरधना के मंच से खुला पुराना हिसाब, पश्चिमी यूपी सियासत फिर क्यों उबल रही है?

पश्चिमी यूपी में सरधना राजनीतिक विवाद अब फुसफुसाहट नहीं रही, खुली बोली बन चुकी है। 29 मार्च के सकौती कार्यक्रम ने यह साफ कर दिया कि 2027 का रास्ता सिर्फ भाषणों से नहीं, जातीय भरोसे, पुराने अपमान और नए गठजोड़ों से तय होगा। मंच पर महाराजा सूरजमल की प्रतिमा थी, लेकिन सियासत की असलियत उस वक्त खुली जब संजीव बालियान ने अपनी हार का हिसाब “सूद व ब्याज समेत” लौटाने की बात कही।

सकौती का कार्यक्रम ऊपर से देखें तो जाट समाज के पूर्वज वीर शिरोमणि महाराजा सूरजमल को श्रद्धांजलि का आयोजन था। मगर उसी मंच ने पश्चिमी यूपी की सियासत का तापमान अचानक बढ़ा दिया। पंजाब के सीएम भगवंत मान, हनुमान बेनीवाल, संजीव बालियान और प्रवीण कुमार जैसे चेहरे वहां पहुंचे, और इससे यह संदेश गया कि यह सिर्फ स्थानीय समारोह नहीं, एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी है।

यहीं अपमान का सार्वजनिक हिसाब पहली बार इतनी खुली भाषा में सामने आया। संजीव बालियान ने कहा कि हार का दुख नहीं होता, दुख उस अपमान का होता है जो षड्यंत्र के तहत कराया गया हो। उन्होंने जाट समाज से यह तक कह दिया कि अगर वह भूल जाएं तो उन्हें याद दिलाया जाए, और अगर समाज भूलने लगे तो वह खुद भूलने नहीं देंगे। एक नेता जब मंच से ऐसी भाषा चुनता है, तो वह केवल दर्द नहीं जता रहा होता, वह अगली लड़ाई की भूमिका भी लिख रहा होता है।

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सरधना सीट मेरठ जिले में है, लेकिन उसका चुनावी असर मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र तक जाता है। यही वह ज़मीन है जहां संजीव बालियान और संगीत सोम दोनों ने अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत की थी। एक दो बार सांसद बना, दूसरा दो बार विधायक रहा, और दोनों की हार ने रिश्ते की बची हुई परत भी उधेड़ दी।

असली कहानी — जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं बताई गई

सकौती का मंच प्रतिमा अनावरण का था, लेकिन असली कहानी प्रतिमा से पीछे खड़ी जातीय गोलबंदी की थी। 2022 में संगीत सोम की हार हुई, 2024 में संजीव बालियान की। दोनों हारों के बाद जो आरोप उभरे, उन्होंने निजी राजनीतिक तकरार को सरधना राजनीतिक विवाद की शक्ल दे दी। यहीं से यह मुआमला सिर्फ दो नेताओं का नहीं रहा, पूरे इलाके की जातीय नब्ज का हिस्सा बन गया।

मंच पर प्रतिमा थी, संदेश बदले का था। यही वह दबा हुआ सच है जिसे औपचारिक बयान कभी सामने नहीं रखते। बालियान ने नाम नहीं लिया, लेकिन “जयचंद”, “विभीषण” और “शिखंडी” जैसे शब्द हवा में यूं ही नहीं छोड़े गए थे। यह भाषा कार्यकर्ताओं के लिए संकेत होती है, समर्थकों के लिए दिशा होती है, और विरोधी खेमे के लिए खुली चेतावनी।

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वो दरार अभी भरी नहीं है

इतना ही नहीं, सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से दोनों नेताओं को साथ बिठाकर गिले-शिकवे दूर कराने की कोशिश का जिक्र भी इस बात का सबूत है कि मामला मामूली नहीं था। अगर समझौता सचमुच हो गया होता, तो मंचों से अपमान का हिसाब चुकाने वाली पंक्तियां वापस नहीं आतीं। शांत शब्दों में कहें तो भाजपा के भीतर की यह रगड़ अब फिर सतह पर दिख रही है।

यहां एक और परत है। जिस कार्यक्रम में जाट अस्मिता का केंद्र बना मंच तैयार हुआ, वहीं रालोद के सबसे बड़े जाट चेहरे जयंत चौधरी की गैरमौजूदगी ने सवाल और गहरे कर दिए। आधिकारिक वजह संसद सत्र बताई गई, लेकिन जब तारीख रविवार निकले तो सियासत सवाल पूछती है, सफाई नहीं मानती। 29 मार्च 2026 रविवार था।

सत्ता का खेल — कौन जीतेगा, कौन हारेगा?

इस पूरे घटनाक्रम में जाट वोट की पकड़ सबसे बड़ा दांव है। संजीव बालियान जाट समाज के बीच अपना भावनात्मक रिश्ता फिर मजबूत करना चाहते दिखते हैं। संगीत सोम भी अगले ही दिन सकौती पहुंचकर महाराजा सूरजमल की मूर्ति पर माल्यार्पण करते हैं, जाट समाज के बीच बैठते हैं, दुख-दर्द सुनते हैं। यह सिर्फ सम्मान नहीं, खोए हुए भरोसे की वापसी की कोशिश है।

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दूसरी तरफ सपा भी तमाशा नहीं देख रही। अतुल प्रधान का रात में ही सकौती पहुंचना बताता है कि विपक्ष इस दरार को मौके में बदलना चाहता है। उसने जाट समाज के साथ खड़े होने का भरोसा दिया और ‘जाट’ शब्द हटाने के विवाद पर समाधान का वादा भी किया। मतलब साफ है: भाजपा के भीतर अगर दरार है, तो सपा उसे चौड़ा करने में देर नहीं करेगी।

घटनाक्रम का क्रम खुद बहुत कुछ कहता है। पहले हार हुई। फिर आरोप लगे। फिर सुलह की कोशिश हुई। फिर मंच से पुराना अपमान दोबारा बोला गया। यही क्रम इस कहानी का अभियोग है।

लेकिन यहां असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन जीतेगा। सवाल यह है कि क्या 2027 से पहले पश्चिमी यूपी की राजनीति विकास, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था से हटकर फिर जातीय ध्रुवीकरण की तरफ धकेली जा रही है।

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