हिना बलूच के एक हालिया बयान ने पाकिस्तान में नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक साक्षात्कार में उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान में बड़ी संख्या में लोग अपनी लैंगिक पहचान खुलकर स्वीकार नहीं करते और सामाजिक दबाव, धर्म तथा पारिवारिक सम्मान के कारण उसे छिपाकर रखते हैं। यह बयान तेजी से प्रसारित हुआ और इसके बाद व्यापक बहस शुरू हो गई। हिना बलूच ने अपने बयान में यह भी कहा कि उनके अनुसार पाकिस्तान की अधिकांश आबादी समलैंगिक या उभयलिंगी है और वहां कोई भी पूरी तरह विषमलैंगिक नहीं है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह उनका निजी दावा है; इसके समर्थन में कोई स्वतंत्र आधिकारिक जनगणना या सार्वजनिक सांख्यिकीय आधार उपलब्ध नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक, हिना बलूच ने कहा कि लोग अक्सर अपनी लैंगिक पहचान से इनकार करते हैं और उसके बचाव में धर्म तथा संस्कृति का सहारा लेते हैं। उन्होंने इसे पाकिस्तानी समाज का एक खुला रहस्य बताया और कहा कि लोग सच जानते हुए भी उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते। उन्होंने अपने निजी अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता अपनी लिंग अभिव्यक्ति को लेकर थी।
उनके अनुसार, परिवार और समाज के डर से वे इस बात को लेकर चिंतित रहती थीं कि स्त्री-सुलभ ढंग से कैसे जिया जाए, बिना अपमान या हिंसा झेले। हिना बलूच का बयान भले ही बहस का विषय बन गया हो, लेकिन पाकिस्तान में समलैंगिक और उभयलिंगी आबादी को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। ब्रिटेन सरकार की पाकिस्तान संबंधी देश-रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विषमलैंगिक मानकों से बाहर की लैंगिक पहचान को औपचारिक मान्यता न मिलने के कारण ऐसे लोगों की संख्या पर आधिकारिक सांख्यिकी मौजूद नहीं है।
इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान में बहुत कम लोग अपनी लैंगिक पहचान खुलकर जाहिर करते हैं, क्योंकि उन्हें भेदभाव, हिंसा और दंडात्मक कानूनों का डर रहता है। मानवाधिकार संगठन भी कह चुके हैं कि पाकिस्तान में समान लिंग संबंधों पर आपराधिक प्रावधान कायम हैं और इससे यौन व लैंगिक अल्पसंख्यकों पर खतरा बढ़ जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, हिना बलूच ने पाकिस्तान के ख्वाजा सिरा समुदाय के सामने मौजूद सामाजिक और आर्थिक शोषण की बात भी उठाई।
उन्होंने कहा कि इस समुदाय के कई लोगों को भीख मांगने, नाचने या देह-आधारित शोषण वाले कामों की ओर धकेल दिया जाता है, जिसके खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई। हिना बलूच आगे चलकर सिंध मूरत मार्च की सह-संस्थापक बनीं और औरत मार्च से भी जुड़ी रहीं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें हिंसक प्रतिरोध, कथित अपहरण और दुर्व्यवहार जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा, जिसके बाद वे पाकिस्तान से बाहर चली गईं। बाद में उन्हें लंदन के एसओएएस विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति मिली और उन्होंने ब्रिटेन में शरणार्थी दर्जे की मांग की।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिना बलूच का बयान पाकिस्तान में यौनिकता, सामाजिक दमन, धार्मिक दबाव और सार्वजनिक चुप्पी पर बहस को फिर सामने ले आया है। लेकिन पत्रकारिता की दृष्टि से यह भी उतना ही जरूरी है कि इतने बड़े दावे को तथ्य नहीं, बल्कि दावा बताकर ही पेश किया जाए, क्योंकि उसके समर्थन में कोई आधिकारिक या व्यापक रूप से सत्यापित आंकड़ा अभी सामने नहीं है।






