नई दिल्ली। अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म परिवर्तन करते ही तुरंत खत्म हो जाता है, लेकिन इसे दोबारा हासिल किया जा सकता है—सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि वापसी के लिए तीन सख्त शर्तें पूरी करनी होंगी, अन्यथा यह दर्जा वापस नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने साफ कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है।
अदालत ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद 3 के तहत यह प्रतिबंध पूरी तरह स्पष्ट है। “अनुच्छेद 3 में शामिल न किए गए किसी भी धर्म को अपनाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह खत्म हो जाता है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा दोबारा हासिल किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए तीन जरूरी शर्तें हैं व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसका जन्म उसी जाति में हुआ था, जो अनुसूचित जाति की सूची में दर्ज है, उसे यह दिखाना होगा कि उसने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में सच्ची और पूर्ण वापसी की है, व्यक्ति को यह भी साबित करना होगा कि उसकी मूल जाति के लोगों ने उसे दोबारा स्वीकार कर लिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं होने पर दर्जा वापस नहीं मिलेगा। यह मामला पादरी सी आनंद से जुड़ा है, जिन्होंने 2021 में ए आर रेड्डी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और एससी/एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। सी आनंद का जन्म अनुसूचित जाति में हुआ था, लेकिन बाद में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया और पादरी के रूप में कार्य कर रहे थे।
उन्होंने आरोप लगाया कि आंध्र प्रदेश के एक गांव में रविवार की प्रार्थना के दौरान उन पर हमला हुआ, जिसके बाद उन्होंने एससी एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई। आरोपियों ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। 30 अप्रैल 2025 को हाई कोर्ट ने कहा: “यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है और उसे सक्रिय रूप से मानता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।”
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराया गया। यह फैसला स्पष्ट करता है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल जन्म से नहीं, बल्कि धर्म और सामाजिक स्वीकृति से भी जुड़ा है। धर्म परिवर्तन के बाद यह दर्जा खत्म हो जाता है, लेकिन सख्त शर्तों के साथ ही इसकी वापसी संभव है।






