इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दर्ज 28 मुकदमे वापस लेने की दी अनुमति, गंभीर मामलों पर 26 फरवरी को सुनवाई
मुजफ्फरनगर। कोरोना महामारी के दौरान जारी दिशा-निर्देशों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में प्रदेश के कई कद्दावर नेताओं को बड़ी राहत मिली है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को 25 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज 28 मामूली मुकदमे वापस लेने की अनुमति प्रदान कर दी है। हालांकि इन नेताओं के खिलाफ विभिन्न अदालतों में चल रहे गंभीर धाराओं वाले मामलों पर अंतिम निर्णय करने के लिए 26 फरवरी की तिथि नियत की गई।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख राजनीतिक चेहरों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से बड़ी कानूनी राहत मिली है। न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 25 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज 28 मुकदमों को वापस लेने की अनुमति दे दी है। ये मुकदमे मुख्य रूप से कोरोना महामारी के काल में लागू दिशा-निर्देशों (कोरोना गाइडलाइन) के उल्लंघन और अन्य लघु आपराधिक आरोपों से संबंधित हैं। इस फैसले से पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान, पूर्व सांसद भारतेन्दु सिंह, पूर्व गन्ना मंत्री सुरेश राणा, पूर्व विधायक उमेश मलिक, राष्ट्रीय लोकदल के विधानमंडल दल के नेता बुढ़ाना विधायक राजपाल सिंह बालियान, थानाभवन से विधायक अशरफ अली खां, शामली से विधायक प्रसन्न चौधरी सहित कुल 25 नेताओं को राहत मिली है। इस कानूनी राहत का लाभ महोबा की उमा भारती, अलीगढ़ के पर्यटन मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह, आजमगढ़ की नीलम सोनकर, जौनपुर की सीमा द्विवेदी, कानपुर के अभिजीत सांगा, उन्नाव के अनिल सिंह, बुलंदशहर के विजेंद्र सिंह व मीनाक्षी सिंह तथा अयोध्या के वेदप्रकाश गुप्ता को भी मिला है।
राज्य सरकार ने इन नेताओं के खिलाफ दर्ज कुल 72 मुकदमों को वापस लेने के लिए उच्च न्यायालय में अर्जियां दाखिल की थीं। न्यायालय की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति एस. डी. सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि जिन मामलों में गंभीर आपराधिक धाराएं नहीं हैं, उन्हें विधि के प्रावधानों के तहत वापस लिया जा सकता है। कोर्ट ने 28 मामलों में केस वापसी की अनुमति प्रदान की है। वहीं, गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में अंतिम आदेश सुरक्षित रखते हुए अगली सुनवाई की तिथि 26 फरवरी निर्धारित की गई है।
जनप्रतिनिधियों सांसद और विधायक के आपराधिक मामलों की वापसी को लेकर अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने दिशा-निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया था कि जनप्रतिनिधियों के मामलों को वापस लेने से पहले संबंधित उच्च न्यायालय से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिकाएं दाखिल कीं। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह लोक अभियोजक के माध्यम से संबंधित जिला न्यायालयों में केस वापसी की अर्जी प्रस्तुत करे, जहां गुण-दोष के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। न्यायालय ने टिप्पणी की कि कोरोना महामारी के दौरान सार्वजनिक सेवा और राजनीतिक गतिविधियों के चलते दर्ज हुए इन अपेक्षाकृत मामूली मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया संबंधित जिलों की अदालतों के माध्यम से पूरी की जाएगी। उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद प्रदेश सरकार को कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।






