अर्जेंटीना में जीएम सोयाबीन के 30 सालः खेती, पर्यावरण और समाज के लिए घातकः टिकैत

भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा-तीन दशकों में छोटे किसानों का पलायन, जंगलों का विनाश और रसायनों का बढ़ता असर बना चिंता का विषय

मुजफ्फरनगर। अर्जेंटीना में जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) सोयाबीन को अपनाने के 30 साल पूर्ण हो चुके हैं, इन वर्षों का अनुभव आज वैश्विक कृषि व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सबक बनकर सामने आया है। आधुनिक खेती के नाम पर शुरू हुआ यह प्रयोग अब खेती, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव छोड़ चुका है।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता और एसकेएम के नेता चौधरी राकेश टिकैत ने अर्जेंटीना में जीएम सोयाबीन के 30 वर्षों के अनुभव को पूरी दुनिया के किसानों के लिए एक आईना बताया। उन्होंने अपनी सोशल साइट पर जारी की एक पोस्ट में कहा कि 25 मार्च 1996 को अर्जेंटीना ने मात्र 81 दिनों के भीतर मोनसेंटो कंपनी के जेनेटिकली मॉडिफाइड सोयाबीन को मंजूरी दे दी थी। यह मंजूरी मुख्य रूप से उसी कंपनी द्वारा प्रस्तुत अध्ययन (स्टडी) पर आधारित थी, जो इस बीज को बाजार में बेच रही थी।

इसे भी पढ़ें:  BY ELECTION--मंगलवार को छह ब्लॉकों के नौ गांवों में मतदान

किसान नेता ने कहा कि शुरुआत में इस तकनीक को आधुनिक कृषि का समाधान बताया गया, लेकिन तीन दशक बाद इसके नतीजे गंभीर रूप में सामने आए हैं। आंकड़ों के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में करीब 83 हजार छोटे किसान खेती से बाहर हो गए। खेती का स्वरूप बदलकर बड़े कॉर्पाेरेट और निर्यात आधारित मॉडल में परिवर्तित हो गया। इस दौरान लगभग 80 लाख हेक्टेयर प्राकृतिक जंगल समाप्त हो गए, जिससे पर्यावरण और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ा। रासायनिक उपयोग (एग्रोकेमिकल्स) में अत्यधिक वृद्धि हुई और हर साल लगभग 50 करोड़ लीटर रसायनों का इस्तेमाल होने लगा। इसका औसत यह है कि प्रति व्यक्ति सालाना लगभग 12 लीटर रसायनों का बोझ पड़ा।

उन्होंने कहा कि इन रसायनों का प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य तक पहुंच गया। जिन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर छिड़काव (स्प्रे) हुआ, वहां कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मामलों में 200 से 250 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई। पराना नदी सहित कई जल स्रोतों में ग्लाइफोसेट जैसे हानिकारक रसायनों के अंश पाए गए, जो इस बात का संकेत हैं कि यह मॉडल पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। इसके अलावा हजारों किसान और आदिवासी परिवार अपनी पारंपरिक जमीन से विस्थापित हो गए और उनका खेती से संबंध टूटता चला गया।

इसे भी पढ़ें:  वार्ड 41 आदर्श कॉलोनी में निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर, सैकड़ों लोगों ने लिया लाभ

भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक लाभ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हुआ। बायर, मोनसेंटो, सिंगेंटा, केमचाइना और कॉर्टेवा जैसी कंपनियों ने बीज, रसायन और निर्यात के माध्यम से भारी मुनाफा कमाया। अर्जेंटीना की उपज का बड़ा हिस्सा यूरोप और एशिया के देशों में पशु चारे के रूप में निर्यात किया जाने लगा, जबकि देश के कई हिस्सों में आम लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई। हालांकि, यह कहानी केवल नकारात्मक नहीं है। इन 30 वर्षों में अर्जेंटीना के किसानों, समुदायों और सामाजिक संगठनों ने लगातार विरोध किया और वैकल्पिक खेती के रास्तों पर काम किया। कई क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती और एग्रोइकोलॉजी को अपनाया गया। सरकारी विश्वविद्यालयों में फूड सॉवरेनिटी (खाद्य संप्रभुता) से जुड़े 60 से अधिक अध्ययन केंद्र स्थापित किए गए, जो टिकाऊ खेती के मॉडल को मजबूत कर रहे हैं।

इसे भी पढ़ें:  उन्नाव रेप केस: कुलदीप सेंगर की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, सुनवाई शुरू

अर्जेंटीना का अनुभव भारत सहित दुनिया के सभी किसानों के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है कि इनपुट आधारित और कॉर्पाेरेट नियंत्रण वाली खेती शुरुआत में आकर्षक लग सकती है, लेकिन लंबे समय में यह किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय निर्भर बनाती है। इससे जमीन की उर्वरता, जल संसाधन और मानव स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि किसान प्राकृतिक खेती, एग्रोइकोलॉजी और बीज व खाद्य संप्रभुता के रास्ते को अपनाएं। यही रास्ता किसानों, खेती और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रख सकता है। अर्जेंटीना की 30 वर्षों की यह यात्रा केवल एक देश की कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि कृषि के क्षेत्र में लिए जाने वाले फैसलों को सोच-समझकर अपनाना आवश्यक है।

Also Read This

शेखपुरा में सरकारी पानी की टंकी के दुरुपयोग से ग्रामीणों में भारी रोष

मुजफ्फरनगर। शेखपुरा गांव में स्थित सरकारी पानी की टंकी के कथित दुरुपयोग को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि टंकी परिसर का इस्तेमाल पूरी तरह से निजी कार्यों के लिए किया जा रहा है। इस संबंध में कई बार प्रशासन से शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई स्थायी कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों के अनुसार, पानी की टंकी की देखरेख के लिए नियुक्त एक युवक और उसका परिवार लंबे समय से टंकी परिसर में ही रह रहा है। इसे भी पढ़ें:  ‘राजा शिवाजी’ फिल्म को टैक्स फ्री करने की मांगआरोप है कि परिसर में सरकारी बिजली, पानी

Read More »

तीसरे दिन भी जारी फर्जी अस्पताल, लैब और क्लीनिक पर प्रशासन का शिकंजा, दो संस्थान सील

खतौली। जनपद में बिना पंजीकरण एवं बिना ने उस डिग्री संचालित हो रहे अस्पतालों, क्लीनिकों और पैथोलॉजी लैब के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग का अभियान लगातार जारी है। खतौली सीएससी प्रभारी डॉ. सतीश कुमार ने स्पष्ट कहा कि मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बिना रजिस्ट्रेशन संचालित सभी अस्पताल, क्लीनिक और लैब के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।उन्होंने बताया कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुनील तेवतिया के निर्देशों के अनुपालन में अपंजीकृत क्लीनिक, अस्पताल एवं पैथोलॉजी लैब के विरुद्ध जांच अभियान चलाया जा रहा है।इसी क्रम में शुक्रवार 15 खतौली क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा जांच अभियान चलाया गया। इसे

Read More »

चिलकाना बस स्टैंड पर महिलाओं से अश्लील हरकत का आरोप, दो युवक गिरफ्तार

सहारनपुर। चिलकाना पुलिस की एंटी रोमियो टीम ने मिशन शक्ति अभियान के तहत कार्रवाई करते हुए दो युवकों को गिरफ्तार किया है। पुलिस का कहना है कि दोनों युवक बस स्टैंड चिलकाना के पास आने-जाने वाली लड़कियों और महिलाओं को देखकर अश्लील इशारे कर रहे थे और फब्तियां कस रहे थे। इसे भी पढ़ें:  मंत्री कपिल देव ने किया निर्माणाधीन रेलवे अंडरपास का स्थलीय निरीक्षणपुलिस के अनुसार, थाना प्रभारी सिमरन सिंह के निर्देशन में एंटी रोमियो टीम क्षेत्र में गश्त कर रही थी। इसी दौरान बस स्टैंड चिलकाना पर दो युवक संदिग्ध हरकत करते दिखाई दिए। आरोप है कि वे वहां से गुजर रही महिलाओं और छात्राओं को देखकर आपत्तिजनक

Read More »