मोबाइल और इंटरनेट की बढ़ती आदत के कारण देसी एवं मैदानी खेलों से दूर होते बच्चे।

गेम’ शब्द गुमनाम हो गया, मोबाइल ‘फील्ड’ बन गया

सहारनपुर । पेड़ की जड़ें, अगर कमजोर होंगी, तो वह खोखला व कमजोर हो जाएगा। हाईटेक हो रहे जमाने की कुछ ऐसी ही विडंबना है, जहां हर उम्र सीमा के लोग आधुनिकता की चादर लपेटने की उधेड़बुन में लगे हुए हैं।

खुद के लिए समय निकालना तो दूर, हम अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन तक नहीं कर पाते हैं। इसी के अभाव में हमारे बच्चे आज के युग में अपने कल को भूल चुके हैं। अब न तो बच्चे गिल्ली डंडा खेलते नजर आते हैं, और न ही चोर सिपाही, लुका-छिपी, लंगड़ी व अन्य देसी खेल। अब मोबाइल ही बच्चों का मैदान बन चुका है। वह घंटों मोबाइल पर चिपके रहते हैं। इसी कारण उनका ठीक से शारीरिक विकास भी नहीं हो पाता। आज से करीब दस साल पहले इन्ही देसी खेलों में बच्चों में अलग स्फूर्ति नजर आती थी, लेकिन अब कंप्यूटर व इंटरनेट ने इन सभी को समेट लिया है। बच्चे बाहरी मैदान से अनजान हो चुके हैं। विशेषज्ञों की मानें तो बदलते समय के साथ अब खेल और खेलने का तरीका बदलता जा रहा है। बच्चों के दिमाग पर क्रिकेट और इंटरनेट के माध्यम से कंप्यूटर गेम हावी हो गया है। इस वजह से बच्चों को बीमारियां जकड़ रही हैं। बच्चे समय से पहले ही मोटे हो रहे हैं। जीवन में खेलकूद काफी उपयोगी हैं, क्योंकि इससे बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास होता है। पहले जहां बच्चे खाली समय में गुल्ली
डंडा, कंचा, लगड़ी टांग, चौपड़, कैरम, लूडो, लुक्का छिपी आदि खेल खेलते थे। इन खेलों से बच्चे स्वस्थ रहते थे। स्कूलों की बात करें तो पहले दौड़, लंबी कूद, ऊंची कूद, कुश्ती, कबड्डी, हॉकी आदि खेल नियमित होते थे। जब खाली समय होता था, तब बच्चे खेल शिक्षक से सामान लेकर खेलने में मस्त हो जाते थे। अब स्कूलों में कक्षा नौ से बारह तक खेल की फीस हर माह ली जाती है, लेकिन नियमित खेल विद्यालयों में नहीं होते। प्रतियोगिताओं के नाम पर भी लकीर पीटी जाती है।

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पहले बच्चे आराम से खेलने के लिए मैदानों में जाते थे, लेकिन अब बच्चों पर पढ़ाई का बोझ डाल दिया गया है। मोबाइल पर गेम खेलने में बच्चे घंटों व्यस्त रहते हैं। इस कारण हमारे पुराने खेल लुप्त होते जा रहे हैं। –

समाजसेवी अतुल पराशर

 

बच्चों को अब स्कूल और किताबों ने इतना उलझा दिया है कि वो पुराने खेलों को भूल गए हैं। जबकि पुराने खेलों से शारीरिक व मानसिक विकास होता था। बच्चों को पुराने खेलों की तरफ बच्चों को ध्यान देना चाहिए। –

युवा उधमी निकुंज बिरला

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