जिलाधिकारी कार्यालय परिसर की अवैध मस्जिद पर ध्वस्तीकरण और साढ़े छह करोड़ का जुर्माना बरकरार

सहारनपुर । हिन्दू जागरण मंच पश्चिम उत्तर प्रदेश के समर्थन से लगी जा रही कानूनी लड़ाई के परिणामस्वरूप जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में स्थित अवैध मस्जिद के मामले में जिला न्यायालय ने अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। जिला न्यायाधीश सत्येंद्र कुमार ने अपने आदेश में नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय के फैसले को पूरी तरह बहाल रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया है, जिससे सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों को तगड़ा झटका लगा है। जिला न्यायाधीश न्यायालय का यह विस्तृत आदेश कुल 26 पृष्ठों का है, जिसमें सभी कानूनी पहलुओं और साक्ष्यों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है।

 

यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया था। जब बजरंग दल नेता विकास त्यागी ने अपनी शिकायत में यह प्रमुखता से उजागर किया था कि अति संवेदनशील और गोपनीय कार्यों वाले जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में अवैध रूप से मस्जिद का निर्माण किया गया है। शिकायत में यह भी बताया गया था कि इस परिसर का उपयोग केवल धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं, बल्कि व्यावसायिक लाभ के लिए भी किया जा रहा था, जहाँ एक डाकघर का संचालन होने के साथ-साथ बाहरी लोगों को कमरे किराए पर दिए गए थे और उनका किराया मस्जिद कमेटी द्वारा वसूला जा रहा था। बाहरी लोगों के दिन-रात बेरोक-टोक आवागमन से जिलाधिकारी कार्यालय की सुरक्षा और गोपनीयता पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया था।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने 24 मार्च 2025 को नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय में पीपी एक्ट के तहत वाद दायर किया था। नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने गत 16 जुलाई 2026 को अपने आदेश में मस्जिद को अवैध मानते हुए बेदखली और 64,165,500 रुपये की भारी-भरकम क्षतिपूर्ति लगाते हुए ध्वस्तीकरण के आदेश जारी किए थे। जिला न्यायालय ने भी अपने इस ताज़ा फैसले में नगर मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई 64,165,500 रुपए की क्षतिपूर्ति को पूरी तरह बरकरार रखा है। इसके बाद मस्जिद पक्ष ने 22 जुलाई 2026 को जिला न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी थी और 24 जुलाई 2026 को स्टे प्राप्त कर लिया था। जिला न्यायालय में चली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों द्वारा रखे गए तर्कों और साक्ष्यों की गहन समीक्षा की गई। मस्जिद पक्ष की ओर से 1 जनवरी 1911 का बिजली का बिल दाखिल कर यह दावा किया गया था कि यह मस्जिद कलेक्ट्रेट से भी पहले की बनी हुई है। इसके प्रतिउत्तर में ठोस साक्ष्यों के आधार पर यह उजागर किया गया कि सहारनपुर शहर में बिजली 1922 में पहुँची थी और इसका वितरण 1928 से शुरू हुआ था, ऐसे में 1911 में बिजली का कनेक्शन प्राप्त होना असंभव है। इसके अतिरिक्त, 1 जनवरी 1911 को रविवार (अवकाश का दिन) होने के कारण उस तिथि को कनेक्शन जारी होने का दावा भी पूरी तरह फर्जी साबित हुआ। इसके अलावा, फसली वर्ष 1296 (सन 1889) के खसरे के अनुसार मौजा पठानपुरा में खेवट ‘सरकार केसरी हिंद’ के रूप में कचहरी और कलेक्ट्रेट ही दर्ज होने से यह स्पष्ट हो गया कि कलेक्ट्रेट से पहले वहाँ किसी मस्जिद का अस्तित्व नहीं था। इस संदर्भ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि खसरा संख्या 539, रकबाई 28.04 बीघा (यानी 5.780 हेक्टेयर), ग्राम पठानपुरा, तहसील व जिला सहारनपुर कचहरी/कलेक्ट्रेट स्थित है, और खसरा संख्या 539 प्रदेश राज्य में निहित सरकारी संपत्ति है। इस पूरे प्रकरण में जिला शासकीय अधिवक्ता विनय चौहान, सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता अवनीश कुमार, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता उमेश त्यागी, जिला शासकीय अधिवक्ता (रेवेन्यू) अजय कुमार सहित अन्य अधिवक्ताओं और समाज के जागरूक लोगों की टीम ने दिन-रात मेहनत कर अत्यंत प्रभावी पैरवी, सार्थक साक्ष्य और पुख्ता प्रमाण जुटाए, जिसके कारण यह ऐतिहासिक परिणाम संभव हो सका है। हिन्दू जागरण मंच के अध्यक्ष ठाकुर सूर्यकांतसिंह ने प्रशासन से मांग करते हुए कहा कि अविलंब अवैध कब्जा का ध्वस्तीकरण किया जाए।

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