एडवोकेट रामधन सिंह की शिकायत पर शासन सक्रिय, राजस्व अभिलेखों में दर्ज निजी नामों को हटाकर सरकारी संपत्ति दर्ज करने के निर्देश
मुजफ्फरनगर। भोपा रोड स्थित खसरा संख्या 3340 को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में नया मोड़ आ गया है। उत्तर प्रदेश शासन ने जिलाधिकारी मुजफ्फरनगर को निर्देश जारी कर उक्त भूमि के संबंध में आवश्यक कार्रवाई करते हुए कब्जा हटवाकर उसे सरकारी भूमि के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने तथा एक सप्ताह के भीतर शासन को रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा है। शासन ने यह कदम अधिवक्ता रामधन सिंह की शिकायत के आधार पर उठाया है, जिसमें भूमि को सरकारी संपत्ति बताते हुए राजस्व अभिलेखों में दर्ज निजी व्यक्तियों के नामों को गलत और विवादित बताया गया है।
भोपा रोड स्थित ग्राम सरवट की खसरा संख्या 3340 को लेकर चल रहे विवाद में उत्तर प्रदेश शासन ने जिलाधिकारी मुजफ्फरनगर को हस्तक्षेप करने के निर्देश दिए हैं। शासन के राजस्व अनुभाग-9 से जारी पत्र में कहा गया है कि सरकारी संपत्ति पर निजी व्यक्तियों द्वारा कराए गए कथित गलत इन्द्राजों को नियमानुसार जांच कर दुरुस्त किया जाए और की गई कार्रवाई से एक सप्ताह के भीतर शासन को अवगत कराया जाए। उप सचिव संजीव कुमार श्रीवास्तव द्वारा 3 जून 2026 को जारी पत्र में बताया गया है कि अधिवक्ता रामधन सिंह द्वारा 1 अप्रैल 2026 को शासन को भेजे गए प्रार्थना पत्र में शिकायत की गई थी कि ग्राम सरवट, नगर पालिका क्षेत्र मुजफ्फरनगर स्थित खसरा संख्या 3340 सरकारी संपत्ति है, लेकिन कुछ निजी व्यक्तियों ने अपने नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करा रखे हैं।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सुरेन्द्र कुमार शर्मा, देवेन्द्र सिंह और मनोज शर्मा सहित कुछ व्यक्तियों ने कथित रूप से फर्जी एवं साजिशपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर उक्त भूमि पर स्वामित्व का दावा किया है। जबकि यह भूमि वर्ष 1921 में ही सरकारी संपत्ति घोषित हो चुकी थी। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसके बावजूद संबंधित व्यक्तियों ने राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज कराकर सरकारी भूमि पर दावा कायम रखा हुआ है। रामधन सिंह ने अपने प्रार्थना पत्र में विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार वर्ष 1991 में दायर वाद संख्या 712, जयप्रकाश बनाम अनिल कुमार आदि में सिविल जज (सीनियर डिवीजन), मुजफ्फरनगर ने 30 मार्च 2010 को दिए गए निर्णय में खसरा संख्या 3340 को सरकारी संपत्ति माना था। इसके बाद इस निर्णय के विरुद्ध दायर सिविल अपील संख्या 42 वर्ष 2010 को भी एडीजे (एफटीसी) मुजफ्फरनगर ने 7 अक्टूबर 2016 को खारिज कर दिया था।
इतना ही नहीं, उक्त निर्णय के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर द्वितीय अपील संख्या 1336 वर्ष 2016 भी 21 अक्टूबर 2019 को निरस्त हो गई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि इन सभी न्यायिक निर्णयों में संबंधित भूमि को सरकारी संपत्ति तथा नाला माना गया है। इसके बावजूद राजस्व अभिलेखों में निजी व्यक्तियों के नाम बने रहना गंभीर प्रश्न खड़े करता है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि संबंधित व्यक्ति न्यायालयी निर्णयों से पूरी तरह अवगत हैं, क्योंकि वे स्वयं इन मामलों में पक्षकार रहे हैं। ऐसे में राजस्व अभिलेखों में उनके नाम बने रहने से आम जनता में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है और सरकारी भूमि पर निजी स्वामित्व का गलत संदेश जा रहा है। शासन द्वारा जारी ताजा निर्देशों के बाद अब जिला प्रशासन की कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं। शासन की ओर से डीएम को इस सम्पत्ति पर काबिज लोगों के नाम हटाकर इसको सरकारी सम्पत्ति के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराने के आदेश दिए हैं।






