नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस उप-निरीक्षक सरिता शाह के वेतन से बिना सुनवाई किए 500 रुपये की कटौती के आदेश को रद्द कर दिया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश, टिहरी गढ़वाल के एक जांच अधिकारी के वेतन से 500 रुपए का मुआवजा काटने का आदेश रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि किसी सरकारी सेवक के वेतन से कटौती का दंड बिना सुनवाई का अवसर दिए नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार उप-निरीक्षक सरिता शाह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सत्र न्यायाधीश, टिहरी गढ़वाल के नवंबर 2013 के आदेश को चुनौती दी थी। आईओ सरिता शाह ने एक बलात्कार के मामले की जांच के बाद दो आरोपितों के खिलाफ धारा 376 और 506 आईपीसी के तहत आरोप पत्र दायर किया था। टन्न्ायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था। उन्हें बरी करते हुए, सत्र न्यायाधीश ने आईओ सरिता शाह पर राय दी कि उन्होंने एक आरोपित को निराधार फंसाया और गिरफ्तार किया। कोर्ट ने धारा 358 के तहत सरिता शाह को 500 रुपए का मुआवजा आरोपित को देने का आदेश दिया तथा एसपी टिहरी को निर्देश दिया कि वे सरिता शाह के वेतन से 500 रुपए काटकर उसे दें। जिला बाल कल्याण समिति, टिहरी गढ़वाल की सदस्य प्रभा रतूड़ी ने अगस्त 2013 में न्यू टिहरी में एक एफआईआर दर्ज कर आरोप लगाया था कि टिहरी गढ़वाल के एक ग्राम के निवासी ने अपनी बेटी के साथ बलात्कार किया। पीड़िता के चाचा ने उसे धमकी दी कि किसी को बताने पर उसके पैर तोड़ देंगे। मामले की जांच के बाद आरोपितों के खिलाफ धारा 376 और 506 आईपीसी के तहत मुकदमा चलाने के लिए चार्जशीट दाखिल की गई जिस पर टन्न्ायल कोर्ट ने आरोप तय किए। सुनवाई के बाद सत्र न्यायाधीश ने आरोपित को बरी कर दिया और यह राय दी कि आईओ सरिता ने बगैर किसी आधार के एक आरोपित को फंसाया और बिना किसी कारण उसे गिरफ्तार किया है जिसके लिए सरिता को आरोपित को अपने वेतन से 500/- रुपए की राशि देने का आदेश दिया। सत्र न्यायाधीश के इस निर्देश को सरिता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट में याची सरिता के अधिवक्ता ने दलील दी कि दुष्कर्म पीड़िता के बयान में आरोपितों के नाम को लेकर कुछ भ्रम था क्योंकि इनके नाम में बहुत ही मामूली सा अंतर दर्ज किया गया था। इस आधार पर सत्र न्यायाधीश ने निर्णय में माना था कि नाम न होने पर भी बिना किसी आधार के आरोपित को मामले में फंसाया गया और गिरफ्तार किया गया। अधिवक्ता ने कहा कि मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ;आईओ) के विरु( धारा 358 सीआरपीसी के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते। यदि गिरफ्तारी निराधार हो तो मुआवजा देने का अधिकार मजिस्टन्न्ेट को है न कि सत्र न्यायाधीश को। अधिवक्ता ने कहा कि वेतन से वसूली का दंड सेवा करियर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, इसलिए कोई भी दंडात्मक टिप्पणी या वसूली का आदेश बिना सुनवाई का अवसर दिए नहीं दिया जा सकता था। न्यायालय ने इन तर्कों से सहमत होते हुए सत्र न्यायाधीश की ओर से लगाए गए जुर्माने की राशि और टिप्पणी निरस्त कर दी।

प्रदेश में इस महीने ज्यादा आएगा बिजली बिल, फ्यूल सरचार्ज 10% तक बढ़ेगा
लखनऊ। जून 2026 के बिजली बिलों में 10 प्रतिशत तक ईंधन और बिजली खरीद समायोजन अधिभार लगाने का फैसला किया है। मार्च में बिजली खरीद और ट्रांसमिशन पर बढ़ी लागत की भरपाई उपभोक्ताओं से की जाएगी। प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं का बिल जून माह में 10 फीसदी अधिक आएगा। यह बढोतरी मार्च माह के ईंधन अधिभार (फ्यूल सरचार्ज) के रूप में होगी। प्रदेश में नए नियमों के तहत ईंधन अधिभार की दर घटती – बढ़ती रहती है। मार्च माह का फ्यूल सरचार्ज जून माह में वसूला जाएगा। ऐसे में जून माह का बिजली बिल करीब 10 फीसदी अधिक आएगा। हालांकि पावर कार्पोरेशन की ओर से जारी आदेश में कहा गया है





