मीरापुर-12 साल बाद फिर सीधे मुकाबले में मिथलेश पाल

मुजफ्फरनगर। भाजपा और रालोद के बीच प्रत्याशी को लेकर चले गहन मंथन और खींचतान के बाद आखिरकार मीरापुर विधानसभा सीट पर राजग गठबंधन प्रत्याशी के रूप में पूर्व विधायक मिथलेश पाल के भाग्य ने जोर मारा और वो रालोद का टिकट उड़ा ले जाने में सफल रही। इस क्षेत्र में विधायक की दावेदारी के रूप में मिथलेश पाल का यह चौथा चुनाव है। इसी क्षेत्र में परिसीमन से पूर्व वो उपचुनाव लड़कर विधायक चुनी गई और उसके बाद लगातार तीन चुनाव लड़े। अब 12 साल बाद वो फिर से रालोद प्रत्याशी के रूप में मीरापुर उपचुनाव के सियासी अखाड़े में सीधे मुकाबले में आ खड़ी हुई हैं।

मंदिर-मोदी लहर में ही जीती भाजपा, लगातार दो जीत का रिकार्ड

मीरापुर विधानसभा सीट के वर्तमान और भूतकाल में राजनीतिक समीकरण और इतिहास की बात करें तो यहां का जनादेश गुर्जर, मुस्लिम और पिछड़ों के ईद-गिर्द ही घूमता रहा है। इस क्षेत्र में भाजपा ने तीन बार, कांग्रेस और बसपा ने दो दो बार जीत हासिल कर अपने विधायक बनवाये हैं। भाजपा ही लगातार दो चुनाव जीत पाने में सफल रही है और समाजवादी पार्टी केवल एक बार यहां चुनाव जीत पाई है। हालांकि सपा ने यहां पर 2017 में प्रचंड मोदी और भाजपा की भगवा लहर के बीच हुए चुनाव में मीरापुर सीट पर ही भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी और लोगों को सपा प्रत्याशी लियाकत अली व भाजपा के पैराशूट प्रत्याशी अवतार भड़ाना के बीच हुई घस्सम-घस्सा वाली चुनावी जंग आज तक भी याद है। मात्र 193 वोटों के मामूली अंतर से यहां सपा पराजित हुई थी। जबकि जिले की अन्य पांचों सीटों पर भाजपा की पूरी एकतरफा आंधी चली थी।

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गुर्जर, पिछड़ा और मुस्लिम वर्ग का ही रहा दबदबा

इस क्षेत्र में 1974 से लेकर 2022 तक हुए विधानसभा चुनावों में राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो पूरी तरह से यहां पर गुर्जर, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग के प्रत्याशियों की दावेदारी को ही जनता ने स्वीकार किया है। हालांकि यहां पर जाट वर्ग से भी प्रत्याशियों को चुनावी अखाड़े में उतारा गया, लेकिन वो कहीं भी टिक न सके। यहां पर पहले चुनाव से 2022 तक के चुनाव में सामने आये जनादेश की बात करें तो हर बाद जनता का मिजाज भी बदला हुआ नजर आया है। कभी जनता ने किसी को आंखों पर बैठाया तो कभी उसी को निचले पायदान पर ले जाकर छोड़ दिया। यह क्षेत्र राजनीतिक विरासत में तीन पीढ़ियों तक साथ खड़ा रहा है। कांग्रेसी नेताओं बाबू नारायण सिंह और सईद मुर्तजा की तीन पीढ़ियों ने यहां पर भाग्य आजमाया, इसमें नायरण सिंह का परिवार ही सौभाग्यशाली रहा, जिसकी तीसरी पीढ़ी तक जनता ने यहां पर अपना जनप्रतिनिधि चुना है।

2012 में पीस पार्टी के बिल्लू ने किया था उलटफेर, इस बार औवेसी पर नजर

इस चुनाव में एक बार फिर से मुस्लिम बनाम पिछड़ा वर्ग के बीच मुकाबला बनता नजर आ रहा है। इस क्षेत्र से विधायक रहे पूर्व सांसद कादिर राना की पुत्रवधु सुम्बूल राना इस बार सपा के टिकट पर मैदान में उतरी हैं। उनके सामने भाजपा-रालोद गठबंधन में पूर्व विधायक मिथलेश पाल, बसपा से शाहनजर, असपास से जाहिद हुसैन और एआईएमआईएम से अरशद राना के साथ ही अन्य प्रत्याशी भी मैदान में उतरने को दावा पेश कर चुके हैं। ऐसे में यहां पर फिर से मुस्लिम बनाम पिछड़ा सियासी समर देखने को मिल पायेगा। मिथलेश पाल यहां पर 2009 में मोरना उपचुनाव में रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ी और जीतकर विधानसभा पहुंची थी। इसके बाद साल 2012 में हुए परिसीमन के बाद यह क्षेत्र मीरापुर विधानसभा सीट के रूप में मशहूर हुआ, तो रालोद ने यहां साल 2012 और फिर 2017 में भी मिथलेश पाल को ही टिकट देकर मैदान में उतरा। 2012 के चुनाव में बसपा और रालोद के बीच सीधा मुकाबला हुआ। बसपा ने यहां पर मौलाना जमील कासमी को टिकट दिया। 56802 वोट लेकर वो विजयी रहे, जबकि मिथलेश पाल को 44069 वोट मिले और वो 12733 वोटों के अंतर से चुनाव हार गई। भाजपा ने जाट समाज से डॉ. वीरपाल निर्वाल तो सपा ने मुस्लिम वर्ग से मेहराजुदीन तेवड़ा को टिकट दिया। इस चुनाव में पीस पार्टी से टिकट लेकर आये बिल्लू उर्फ जय सिंह ने बड़ा उलटफेर किया और 13650 वोट प्राप्त किये। मिथलेश की हार में बिल्लू को मिले जनसमर्थन को ही मुख्य कारण माना गया, क्योंकि बिल्लू ने पिछड़ा समाज के वोटरों में सेंधमारी की।

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2017 में मोदी मैजिक के बावजूद मीरापुर पर सपा ने दी थी कड़ी टक्कर

साल 2017 में मिथलेश फिर मैदान में आई और इस बार यूपी में मोदी लहर का मैजिक चला, लेकिन मीरापुर सीट इससे अछूती ही नजर आई। यहां पर सपा के लियाकत अली ने भाजपा के अवतार भड़ाना को बेहद मजबूत टक्कर दी। भाजपा प्रत्याशी को 69035 और सपा प्रत्याशी को 68842 वोट मिले। भाजपा केवल 193 वोटों के अंतर से जीती। मिथलेश पाल रालोद प्रत्याशी के रूप में पांच साल पुराने अपने प्रदर्शन के मुकाबिल आधे वोटों पर आ गई और उनको 22751 वोट मिले। मुकाबले में वो चौथे स्थान पर रही। अब 2024 में मीरापुर सीट पर उपचुनाव में मिथलेश पाल के भाग्य ने टिकट तक तो जोर मारा है, लेकिन क्या वो मोरना उपचुनाव जैसा प्रदर्शन दोहराकर भाजपा और रालोद के बेस वोट बैंक के सहारे जीत दर्ज कर पायेंगे, यह अभी सवाल बाकी है, लेकिन इस क्षेत्र के वोटरों का जो मिजाज रहा है, उसके इतिहास पन्नों को टटोलकर यही कहा जा सकता है कि ये उपचुनाव भी इतना आसान नहीं होने वाला है। बसपा और आसपा के साथ ही एआईएमआईएम के प्रत्याशी चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की पूरी तैयारी और ताकत रखते हैं। 

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