नई दिल्ली। शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने देशभर के लाखों सेवारत शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि सेवा में बने रहने और पदोन्नति के लिए टीईटी योग्यता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने शिक्षकों को राहत देते हुए समय-सीमा जरूर बढ़ाई है, लेकिन परीक्षा से पूरी छूट देने की मांग स्वीकार नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार अब संबंधित शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक TET योग्यता हासिल करनी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा है कि राज्यों और सक्षम प्राधिकारियों को नियमित रूप से, बेहतर हो तो साल में दो बार, TET कराना चाहिए ताकि शिक्षकों को पर्याप्त अवसर मिल सके।
इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में नॉन-TET क्वालिफाइड शिक्षकों के बीच बेचैनी है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देशभर में 20 लाख से ज्यादा शिक्षक इस फैसले से प्रभावित हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में करीब 1.86 लाख, मध्य प्रदेश में करीब 1.5 लाख, झारखंड में करीब 40 हजार और छत्तीसगढ़ में लगभग 85 हजार शिक्षकों पर इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
कोर्ट ने छूट नहीं दी, सिर्फ समय बढ़ाया
शिक्षक संगठनों और कई राज्यों की ओर से यह तर्क रखा गया था कि बड़ी संख्या में शिक्षक ऐसे हैं, जिनकी नियुक्ति उस समय हुई थी जब TET अनिवार्य शर्त नहीं थी। ऐसे में लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों पर बाद में परीक्षा पास करने का दबाव उचित नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों के हित को केंद्र में रखकर पढ़ा जाना चाहिए। अदालत ने यह भी साफ किया कि शिक्षक सेवा का सवाल बच्चों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने पहले तय समय-सीमा 31 अगस्त 2027 को बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि आगे समय बढ़ाने की मांग पर विचार नहीं किया जाएगा।
पांच साल से ज्यादा सेवा बाकी है तो परीक्षा जरूरी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बड़ा असर उन शिक्षकों पर पड़ेगा जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच साल से ज्यादा समय बचा है और जिन्होंने अब तक TET पास नहीं की है। ऐसे शिक्षकों को अब तय समय-सीमा के भीतर परीक्षा पास करनी होगी। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पदोन्नति के लिए भी TET योग्यता जरूरी रहेगी, चाहे शिक्षक की शेष सेवा अवधि कितनी भी हो।
यही वजह है कि कई राज्यों में शिक्षकों के बीच नौकरी, पदोन्नति और पेंशन सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। शिक्षक संगठनों का कहना है कि लंबे समय से सेवा कर रहे शिक्षकों को अचानक परीक्षा के दबाव में डालना व्यावहारिक नहीं है। वहीं अदालत का रुख यह है कि शिक्षण गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ में राहत के विकल्पों पर मंथन
छत्तीसगढ़ में इस फैसले के बाद स्कूल शिक्षा विभाग और राज्य सरकार स्तर पर राहत के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार विभागीय सीमित शिक्षक पात्रता परीक्षा, न्यूनतम अंकों में राहत और नियमित अंतराल पर परीक्षा कराने जैसे विकल्पों पर विचार हो रहा है। शिक्षक संघों की मांग है कि कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग से व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जाए, ताकि वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों की सेवा पर सीधे संकट न आए।
विचाराधीन विकल्पों में सबसे अहम प्रस्ताव सीमित विभागीय परीक्षा का माना जा रहा है। इसके अलावा TET पासिंग मार्क्स में छूट और साल में नियमित परीक्षा आयोजित कराने की मांग भी उठ रही है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि अगर सरकारें समय पर परीक्षा कराएं और तैयारी का अवसर दें, तो बड़ी संख्या में शिक्षक इस संकट से बाहर आ सकते हैं।
शिक्षक संघों ने केंद्र से अध्यादेश की मांग उठाई
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक संगठन सक्रिय हो गए हैं। अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ के महासचिव दिलीप चौहान ने केंद्र सरकार से अध्यादेश लाकर सेवारत शिक्षकों को TET अनिवार्यता से राहत देने की मांग की है। वहीं महासंघ के संयोजक और ऑल इंडिया बीटीसी शिक्षक संघ के अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा है कि शिक्षक संगठन इस मुद्दे पर एकजुट होकर आंदोलन की तैयारी करेंगे।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि जो शिक्षक 10 से 15 साल या उससे अधिक समय से स्कूलों में सेवाएं दे रहे हैं, उनके अनुभव को भी नीति बनाते समय महत्व दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि TET जैसी पात्रता परीक्षा से स्कूल शिक्षा में न्यूनतम गुणवत्ता मानक तय होते हैं और इसे पूरी तरह खत्म करना बच्चों के हित में नहीं होगा।
राज्यों के सामने अब दोहरी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्यों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। पहली चुनौती यह है कि नॉन-TET शिक्षकों को समय रहते परीक्षा पास कराने के लिए नियमित और पर्याप्त अवसर दिए जाएं। दूसरी चुनौती यह है कि यदि बड़ी संख्या में शिक्षक समय-सीमा के भीतर परीक्षा पास नहीं कर पाए तो स्कूलों में स्टाफ की कमी न पैदा हो।
कोर्ट ने राज्यों से कहा है कि TET नियमित रूप से कराया जाए और बेहतर हो तो साल में दो बार परीक्षा आयोजित हो। इसका मतलब साफ है कि अब राज्य सरकारों को परीक्षा कैलेंडर, प्रशिक्षण व्यवस्था और शिक्षकों की तैयारी के लिए ठोस योजना बनानी होगी।
अब आगे क्या होगा?
फैसले के बाद सभी की नजर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के अगले कदम पर है। शिक्षक संगठन राहत के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों रास्ते तलाश रहे हैं। वहीं सरकारें विभागीय परीक्षा, पासिंग मार्क्स में छूट और विशेष TET जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है—TET से पूरी छूट नहीं मिलेगी। राहत सिर्फ इतनी है कि शिक्षकों को अब 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया गया है। इस समय का उपयोग शिक्षक तैयारी में करें और सरकारें परीक्षा व प्रशिक्षण की व्यवस्था समय पर करें, यही इस फैसले के बाद सबसे व्यावहारिक रास्ता दिखाई देता है।





