संभल हिंसा केस: FIR आदेश देने वाले जज का तबादला, बवाल

संभल/चंदौसी। संभल हिंसा मामले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने वाले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर के तबादले के बाद जिले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो गई है। बुधवार को वकीलों ने चंदौसी कोतवाली के पास प्रदर्शन कर सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

प्रदर्शनकारी वकीलों का कहना है कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक आदेश देने की कीमत जज को तबादले के रूप में चुकानी पड़ी, जो न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।

‘न्याय की हत्या’ बताया तबादला

वकीलों ने CJM के ट्रांसफर को “न्याय की हत्या” करार देते हुए आरोप लगाया कि एक सख्त और ईमानदार जज को दंडित किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह सामान्य प्रशासनिक तबादला नहीं, बल्कि न्यायिक फैसले के बाद की गई कार्रवाई प्रतीत होती है।

इसे भी पढ़ें:  MUZAFFARNAGAR-पालिका से पत्रावलियां गायब होने पर मीनाक्षी स्वरूप सख्त

प्रदर्शन के दौरान वकीलों ने कहा कि “अच्छे जज को नीचे भेजा जा रहा है, ताकि भविष्य में कोई ऐसा आदेश देने की हिम्मत न करे।”

क्या है पूरा मामला

दरअसल, संभल हिंसा के दौरान गोली लगने से घायल हुए युवक आलम के पिता की याचिका पर CJM विभांशु सुधीर ने बड़ा कदम उठाया था। उन्होंने ASP अनुज चौधरी समेत करीब 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।

इसे भी पढ़ें:  रामनवमी पर बड़ा ऐलान: सनातन धर्म सभा सहित धार्मिक संस्थाओं को पालिका कर से मिलेगी मुक्ति

वकीलों का आरोप है कि यही आदेश उनके तबादले की वजह बना।

अखिलेश यादव ने उठाए सवाल

मामले ने सियासी तूल भी पकड़ लिया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जज के तबादले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट स्वयं संज्ञान लेंगे।

इसे भी पढ़ें:  MUZAFFARNAGAR-सीमा विस्तारित क्षेत्र के नागरिक काट रहे चक्कर

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा—

“सत्य का स्थानांतरण नहीं होता, उसका स्थान अचल है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का हनन सीधे-सीधे लोकतंत्र का हनन है। स्वतंत्र न्यायपालिका ही संविधान की वास्तविक संरक्षक है।”

न्यायिक स्वतंत्रता पर उठते सवाल

कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि न्यायिक आदेशों के बाद इस तरह के तबादले होते हैं, तो इससे निचली अदालतों पर दबाव का संदेश जाता है। वकीलों ने चेतावनी दी है कि यदि इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं हुआ, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।

Share This Article