लावारिसों की वारिस शालू सैनी बनी गरीब परिवार का सहारा

कृष्णापुरी क्षेत्र में बेसहारा बुजुर्ग महिलाओं के लिए एक आश्रम की भी शुरुआत की है, जहां जरूरतमंदों को आश्रय और देखभाल मिल रही है

मुजफ्फरनगर। शहर में मानवता की मिसाल बन चुकी साक्षी वेलफेयर समिति की अध्यक्ष शालू सैनी ने एक बार फिर संवेदनशीलता और सेवा का परिचय देते हुए दो अज्ञात समेत तीन शवों का विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया। आर्थिक तंगी से जूझ रहे एक गरीब परिवार के पास क्रिया-कर्म के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी, ऐसे में शालू सैनी ने आगे बढ़कर न केवल अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई, बल्कि परिवार को हरसंभव सांत्वना और सहयोग भी प्रदान किया।

लावारिस और असहाय लोगों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार को अपना जीवन उद्देश्य बना चुकी शालू सैनी अब तक हजारों शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने सामाजिक सहयोग से कृष्णापुरी क्षेत्र में बेसहारा बुजुर्ग महिलाओं के लिए एक आश्रम की भी शुरुआत की है, जहां जरूरतमंदों को आश्रय और देखभाल मिल रही है। मानव सेवा के इस अनूठे कार्य के लिए वे लावारिस शवों के सर्वाधिक अंतिम संस्कार कर विश्व रिकॉर्ड भी बना चुकी हैं। जनपद के सिखेड़ा थाना और खतौली थाना क्षेत्र से मिले दो लावारिस शवों को समाज की भीड़ ने भले ही अनदेखा कर दिया हो, लेकिन क्रांतिकारी शालू सैनी ने उन्हें अपना मानकर कंधा दिया।

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उन्होंने न केवल विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया, बल्कि बहन बनकर उन अनजानों को सम्मानपूर्वक मोक्ष के द्वार तक पहुंचाया। तीसरा मामला एक बेहद गरीब परिवार से जुड़ा था, जिनके पास अपने परिजन के अंतिम संस्कार तक के लिए धन नहीं था। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे अंतिम क्रिया के खर्च तक जुटाने में असमर्थ थे। ऐसे कठिन समय में क्रांतिकारी शालू सैनी उस परिवार के लिए सहारा बनकर खड़ी हुईं। उन्होंने न केवल आर्थिक सहयोग दिया, बल्कि परिवार का हिस्सा बनकर पूरे रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार संपन्न कराया। परिवार की अस्मिता और संवेदनाओं का सम्मान करते हुए मृतक का नाम और पता गोपनीय रखा गया।

श्मशान घाट पर जब चिता जली, तो वहां मौजूद लोगों की आंखें नम थीं। एक ओर शोक का सन्नाटा था, तो दूसरी ओर क्रांतिकारी शालू सैनी का अटूट साहस और करुणा की भावना थी। उन्होंने साबित कर दिया कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि संवेदनाओं से बनते हैं। आज जब समाज में लोग अपनों से भी मुंह मोड़ लेते हैं, ऐसे समय में क्रांतिकारी शालू सैनी जैसे लोग इंसानियत की लौ जलाए हुए हैं। लावारिस शवों को कंधा देना और गरीब परिवार की बेटी-बहन बनकर अंतिम विदाई देना केवल सेवा नहीं, बल्कि सच्ची मानवता है। वास्तव में, क्रांतिकारी शालू सैनी उन लावारिसों की वारिस बन चुकी हैं, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं था।

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