भक्तामर महामंडल विधान के 17वें दिन हुआ विशेष अनुष्ठान, महाराज श्री ने बताया भक्तामर का दिव्य अर्थ

नयन जागृति डेस्क | आचार्य श्री 108 अरुण सागर जी महाराज के सान्निध्य में चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के 17वें दिन का आयोजन गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ।

इस विशेष अवसर पर श्री डॉ. डी.के. जैन द्वारा श्री जी की प्रथम शांतिधारा की गई, तत्पश्चात मनीष जैन (अमेरिका) ने द्वितीय शांतिधारा कर विधिपूर्वक विधान का शुभारंभ किया। दिनभर चले इस आयोजन में मुख्य विधान भी डॉ. डी.के. जैन द्वारा ही कराया गया।

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महाराज श्री ने किया 17वें श्लोक का गूढ़ अर्थ स्पष्ट

अपने दिव्य प्रवचनों में आचार्य श्री 108 अरुण सागर जी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र के 17वें श्लोक का सार श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा:

“नास्तं कादाचिदुपयासि न राहुगम्यः।

स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति ॥

नाम्भोधरोदर निरुद्धमहाप्रभावः ।

सूर्यातिशायिमहिमासि मुनीन्द्र! लोके॥”

इसका भावार्थ बताते हुए उन्होंने कहा, “हे मुनीन्द्र! आप सूर्य की भांति कभी अस्त नहीं होते, न ही राहु द्वारा ग्रसित होते हैं और न ही मेघों से आपकी आभा दबती है। आपके ज्ञान का तेज इतना व्यापक है कि तीनों लोकों को एक साथ प्रकाशित कर देता है। आप सूर्य से भी अधिक महिमावान हैं।”

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उन्होंने आगे कहा कि भक्तामर स्तोत्र केवल स्तुति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का महान स्रोत है। इसे आचार्य मानतुंग ने भगवान आदिनाथ की स्तुति में रचा था और यह आज भी साधकों के जीवन में चमत्कारिक परिणाम देता है।

इस विशेष दिन पर जैन समाज की विशाल सहभागिता देखने को मिली। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं में शामिल नीलिमा जैन, नूतन जैन, चंदन जैन, शिल्पी जैन, सविता जैन, मोना जैन, आस्था जैन, नीतू जैन, अनिल जैन, सुनील जैन, अनुज जैन, सुदेश जैन, अभिषेक जैन, अजय जैन, प्रदीप जैन, रविंद्र जैन, मनोज जैन, विनय जैन सहित समस्त जैन समाज।

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