आचार्य श्री 108 अरुण सागर जी महाराज के मार्गदर्शन में भक्तांमर महामंडल विधान के छठे दिन शांतिधारा व प्रवचन का आयोजन

देवबंद – आचार्य श्री 108 अरुण सागर जी महाराज के सान्निध्य में चल रहे 48 दिवसीय भक्तांमर महामंडल विधान के छठे दिन श्रद्धा और भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिला। इस अवसर पर श्री अजय कुमार एवं डॉ. पारस जैन द्वारा श्री जी की शांतिधारा कर विधिविधानपूर्वक भक्तांमर महामंडल विधान का आयोजन संपन्न कराया गया।

मंच से अपने दिव्य प्रवचनों में आचार्य श्री ने भक्तामर स्तोत्र के छठवें श्लोक—

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“अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,

त्वद्-भक्तिरेव मुखरी कुरुते बलान्माम।

यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,

तच्चाम-चारु-कलिका-निकरैक-हेतुः॥”

—का वाचन कर उसके गूढ़ अर्थों को सरल व सारगर्भित रूप में श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह श्लोक भगवान के प्रति एक सच्चे भक्त की विनम्रता और अपार भक्ति का प्रतीक है। भक्त यह स्वीकार करता है कि वह ज्ञान में अल्प है, किंतु भगवान की भक्ति उसे वाणी की मधुरता और प्रभावशीलता प्रदान करती है। जैसे कोयल वसंत ऋतु में आम के मंजरों के कारण मधुर स्वर में गाती है, वैसे ही भगवान की भक्ति से भक्त की वाणी मधुर और प्रभावशाली बनती है।

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आचार्य श्री ने बताया कि यह श्लोक भक्तामर स्तोत्र के 6वें पद का अंश है, जिसकी रचना आचार्य मानतुंग ने भगवान आदिनाथ की स्तुति में की थी। यह स्तोत्र जैन धर्म में अत्यंत श्रद्धा और शक्ति से परिपूर्ण माना जाता है। नियमित पाठ से जीवन की बाधाएं और विघ्न दूर होते हैं।

इस पावन विधान में अर्चना जैन, चंदन जैन, शिल्पी जैन, सविता जैन, मोना जैन, आस्था जैन, नीतू जैन, अनुज जैन, सुदेश जैन, अभिषेक जैन, अजय जैन, प्रदीप जैन, रविंद्र जैन, मनोज जैन, विनय जैन सहित सकल जैन समाज ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया।

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